Thursday, February 15, 2018

तवायफ लखनऊ की -- भाग दो 15-2-18

तवायफ लखनऊ की -- भाग दो
तवायफ तथा उनके समकक्षी वर्ग


लखनऊ में आकर बसने वाली तवायफो में कंचनिया , चुनेवालिया , और नागरानियाँ कही जाने वाली तीन श्रेणीयो के नाम प्रसिद्द रहे है | कंचनिया श्रेणी की तवायफो के बारे में कहा जाता है कि ये शुजाउदौला ( १७५४ - १७७५ ) के समय पंजाब और दिल्ली से आकर लखनऊ में बस गयी थी | प्रारम्भ में इनका व्यवसायिक धंधा नाचना , गाना भले ही रहा हो किन्तु बाद में वह देह व्यापार तक सिमित होकर रह गया था | चूने वालियों के सम्बन्ध में कहा जाता है की उनकी आवाज बहुत सुरीली हुआ करती थी | सोज श्रेणी के गायन की प्रस्तुती में इन्हें महारथ हासिल थी | चूने वाली हैदर का सोज प्रस्तुती में इतना नाम था की उसके गले से सोज सुनने के लिए लोग मोहर्रम की प्रतीक्षा में दिन गिनते रहते और मोहर्रम आने पर बड़े इमामबाड़ा के सामने सैकड़ो की संख्या में लोग घंटो खड़े रहकर उसके आने की प्रतीक्षा करते थे | नागरानियो का नाम अति सम्मानित श्रेणी की तवायफो में आता था |
इन श्रेणियों के अतिक्रिकत नाचने - गाने वाली महिलाओं की कुछ अन्य श्रेणियों के नामो का भी उल्लेख्य मिलता है जिनके लखनऊ में आकर बस जाने अथवा मात्र लखनऊ में आते - जाते रहने के सम्बन्ध में विद्वतजन एकमत नही |
डेरेदार : डेरेदार कही जाने वाली तवायफो ने अपनी उत्कृष्ट गायन की प्रस्तुती के माध्यम से लखनऊ में अपनी उपस्थिति जोर - शोर से दर्ज की थी | डेरेदार तवायफो का नाम अन्य तवायफो की अपेक्षा सबसे ऊँची एवं श्रेष्ठ श्रेणी में रखागया था | इन्हें डेरे वालियाँ भी कहा जाता था | ये मूल रूप से पंजाब की रहने वाली थी | कहा जाता है की इस श्रेणी की तवायफो के पुरुष अपनी बहन - बेटियों को अपेक्षित प्रशिक्षण देकर सार्वजनिक रूप से गाने - बजाने के काम में लगा देते थे | कालान्तर , देश - काल व परिस्थितियों के अनुरूप ये अपने आप को ढालती चली गयी और क्रमश: उन लोगो ने समाज में अपना अति विशिष्ट स्थान बना लिया |
डुमनी; जो पर्दानशी औरते महल के अन्दर गायन वादन और नृत्य का कर्म सम्पादित करते हुए अपनी जीविका का निर्वाह करती थी उन्हें डुमनी कहा जाता था | इनकी आवाज दिलकश हुआ करती थी एवं इन्हें संगीत विधा की राग - रागनियो का ज्ञान रहता था | इस श्रेणी की महिलाओं को पुरुषो के सामने आने की अनुमति नही थी |
ढाडी: यु तो डुमनी के पिता या भ्राता को ढाडी कहा जता था किन्तु इतिहास में उपलब्ध अन्य संदर्भो में इन्हें तवायफो से जुदा माना गया कारण की ये तवायफो के कार्यक्रमों के व्यवस्थापक हुआ करते थे | मोहम्मद करम इमाम ढाडीयो , तवायफो और सफरदाइयो ( संगत करने वालो ) को साथ गिनाया है | उनके कथानुसार ढाडी बेहद खब्ती और बेम्जे थे तथा वैश्याओ के गुरु हुआ करते थे | ढाडी लोग अपने आपको डेरेदारवालियों से श्रेष्ट मानते थे |
ढफजन : इस श्रेणी की नारिया ढफ अथवा ढोल बजाते हुए धुर्वपद , सोहेला , वर्षगाठ व विवाह के गीत गाती थी | किसी युग में ये मात्र महिलाओं के बीच ही अपना कार्यक्रम प्रस्तुत कर सकती थी | किन्तु अकबर के समय से ये सामान्य जन साधारण के बीच भी अपनी कला का प्रदर्शन करने लगी |
गौनाहर : वर्तमान लखनऊ में ढफजन की ये गायिकाये आज भी गौनाहर के नाम से ख्यातिलब्द है | महिलाओं के बीच नाचते - गाते समय ये तवायफो की तरह किसी एक श्रोता महिला की धोती का पल्ला पकड़कर हावभाव दर्शाने और पकडे गये पल्ले को तब तक नही छोडती जब तक की न्योछावर के रूप में इन्हें इनाम न मिल जाए | ये गौनाहरे वास्तव में तवायफ तो नही कही जा सकती किन्तु इनकी कार्यशैली एक दम तवायफो जैसी होती है | अंतर मात्र इतना की ये मात्र महिलाओं के समूह के बीच में ही गाती , बजाती , नृत्य करती है जब की तवायफो को पुरुषो की उपस्थिति से कोई परहेज नही | बदले हुए समय के अनुरूप अब इनकी सेवाए बिरले ही उपलब्द्ध होती है लखनऊ के पुराने मोहल्लो की गलियों व कुचो में इनके कुछ समूह आज भी सामान्य जीवन यापन करते मिल जायेंगे और आश्चर्य की उनके आसपास रहने वाले तक नही जानते की वे गौनाहार समूह से जुडी है |
- सुनील दत्ता -- स्वतंत्र पत्रकार -- समीक्षक

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