Friday, December 8, 2017

काफी हाउस भाग दो 8-12-17

काफी हाउस भाग दो
ऐतिहासिक दिन
नियमित जाते रहे पूर्व प्रधानमन्त्री चन्द्रशेखर जी काफी हाउस
जन चेतना की आवाज रही काफी हाउस आभार
16 अगस्त 2011 हजरतगंज के जहागीराबाद बिल्डिंग में स्थित काफी हाउस के लिए एक ऐतिहासिक दिन था | उस दिन स्वतंत्रता दिवस मनाने के नाम पर वे तमाम लोग आये जो पिछले चालीस व पचास सालो में काफी हाउस आते रहे है |
नवासी वर्ष के वरिष्ठ पत्रकार विध्यासागर से लेकर लखनऊ के तीन बार के मेयर डा दाउजी गुप्त , इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश हैदर अब्बास , वरिष्ठ पत्रकार राजनाथ सिंह , अजय कुमार वरिष्ठ अर्थशास्त्री हिरनमय – धर साहित्यकारों में रविन्द्र वर्मा , वीरेन्द्र यादव वकील सिद्दीकी , रवि भट्ट वन्दना मिश्रा रंगकर्मी राकेश , सामाजिक कार्यकर्ता प्रकाश पन्त , जवाहर अग्रवाल , शैलेश अस्थाना , राजेश पाण्डेय , भोला बाबू कांग्रेस के नेता रामकुमार भार्गव , पूर्व मंत्री व कांग्रेस के नेता सत्यदेव त्रिपाठी , पत्रकार अशोक निगम आदि लोगो का जुटान हुआ आने वालो में वे लोग भी शामिल थे जो आज भी नियमित है जैसे लखनऊ विश्व विद्यालय के राजनीतिशास्त्र विभाग के डा रमेश दीक्षित , सामाजिक कार्यकर्ता सुभाष कपूर , कांग्रेस के अरुण प्रकाश आदि |
इस बैठक को सफल बनाने के लिए काफी हॉउस वर्कर्स सोसायटी की सचिव अरुणा सिंह ने काफी प्रयास किया था | आये हुए लोगो को उन तमाम विशिष्ठ लोगो की कमी खली जिनका पिछले पचास सालो में निधन हो गया था | काफी हाउस की इस ऐतिहासिक बैठक में लोगो ने काफी हाउस से जुडी अपनी यादे व संस्मरण रखे जो बड़े रोचक थे | तमाम लोगो ने बताया की इंकलाबी शायर मजाज कहाँ बैठते थे और पूर्व प्रधानमन्त्री चन्द्रशेखर जी काफी हाउस के किस कोने को रौनक करते थे | सबने वायदा भी किया की अब पहले की तरह काफी हाउस में में आना शुरू कर देंगे |
वरिष्ठ पत्रकार विद्यासागर इस बैठक से काफी उत्साहित दिखाई दे रहे थे | वे अकेले व्यक्ति थे जो पचास साल से नियमित काफी हाउस आते रहे | उन्होंने भी वायदा किया की वे भी समय – समय पर काफी हाउस आने का प्रयास करेंगे | 16 अगस्त की बैठक में आने लोग इतना भावुक हो गये की उनकी आँखे उन तमाम लोगो को खोज रही थी जो वर्षो पहले आते थे पर अब इस दुनिया में नही है | वे खासतौर से काफी हाउस के उन बेयरो को भी खोज रही थी जो सबके मित्र थे और काफी पिलाने के साथ पैसा न हो तो अपनी तरफ से उधार भी देते थे |
अब फिर से काफी हाउस आबाद हो गया है नई पीढ़ी के साथ पुराने लोगो ने भी आना शुरू कर दिया है | अभी कुछ दिन पहले लखनऊ विश्व विद्यालय की पूर्व कुलपति व सामाजिक कार्यकर्ता रुपरेखा वर्मा , वरिष्ठ साहित्यकार मुद्रा राक्षस तथा अन्य लोगो के साथ काफी हाउस में वार्ता करती दिखाई दी |
इसी तरह पूर्व मेयर दाउजी गुप्त के साथ सुभाष कपूर पत्रकार ताहिर अनूप श्रीवास्तव नियमित हो गये है | कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पूर्व मंत्री सत्यदेव त्रिपाठी भी जब आना होता हो बता देते थे | डा रमेश दीक्षित के साथ कामरेड अतुल अनजान , अगर वो लखनऊ में होते तो साथ में बैठकी करते थे | अभी हाल में जब सुरेन्द्र राजपूत को उत्तर प्रदेश की काग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा ने काग्रेस की मीडिया प्रचार कमेटी का सदस्य नियुक्त किया तो उन्होंने तमाम मित्रो को खासतौर से वे जो रोज उनके साथ सिकन्दर बाग़ में सुबह की सैर करते है काफी हाउस में निमंत्रित किया | उस दिन आने वालो में के जी मेडिकल कालेज के डा नसीम जमाल , वरिष्ठ बन विभाग अधिकारी व शायर मो अहसन , पूर्व बैंक अफसर इकबाल हाईकोर्ट के वकील धुर्व कुमार जहाज के कप्तान आई ए खान और बाद में अरुण प्रकाश भी इस लेखक के साथ शामिल हुआ | सबने काफी पी व नसीम जमाल और मो अहसन से शायरी सुनी मिनी लोहिया के नाम से प्रसिद्द समाजवादी विचारधारा के पोषक और ओजस्वी वक्ता जनेश्वर मिश्रा जी जब लखनऊ आते थे तो सारा समय काफी हाउस में ही बीतता था | वरिष्ठ राजनेता व पूर्व मंत्री ओमप्रकाश श्रीवास्तव ने बताया की उन्होंने और चन्द्रशेखर जी ने 1951 से बैठना शुरू कर दिया था |
एक बार लखनऊ प्रेस क्लब में भोजन के बाद चन्द्रशेखर जी जब लखनऊ में बिताये हुए दिनों को याद कर रहे थे तो उन्होंने मुझे बताया कि वे ए पी सेन रोड पे रहते थे और वहाँ से रिक्शे में काफी हाउस आते थे | हजरतगंज पैदल ही टहलते थे वरिष्ठ पत्रकार विद्यासागर ने , जो काफी हाउस में पांच दशको तक नियमित बैठते रहे बताया की चन्द्रशेखर जी की टेबिल तय थी और वे 11 बजे के करीब काफी हाउस आते थे और कई घंटे चर्चा में व्यस्त रहते थे |
चन्द्रशेखर जी के साथ काफी हाउस में नियमित बैठने वालो में वरिष्ठ पत्रकारों की टोली विद्यासागर बिष्ण कपूर लक्ष्मीकांत तिवारी एस एम् जफर रमेश पहलवान राजनितिक नेताओं में उनके परम मित्र श्री पद्माकर लाल ,हसन वकील ,राजा बक्शी स्वतंत्रता सेनानी व पुलिस के वरिष्ठ अफसर बलिया के पारसनाथ मिश्र जी भी थे | कार्टूनिस्ट राम उग्रह भी साथ बैठते थे | कुछ वर्षो पहले पूर्व प्रधानमन्त्री चन्द्रशेखर जी से तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री दिग्विजय सिंह के घर पर मारीशस के प्रधानमन्त्री के सम्मान में आयोजित भोज में मेरी भेट हो गयी | चन्द्रशेखर जी के साथ वरिष्ठ पत्रकार प्रभास जोशी भी थे | चन्द्रशेखर जी ने उनसे कहा की अब प्रदीप मिल गये है तो लखनऊ काफी हाउस की खबर लेते है | वे विस्तार पूर्वक काफी हाउस के समाचार लेते रहे | उन्हें ख़ुशी हुई की उनका अपना पुराना अड्डा काफी हाउस जो काफी समय से बंद चल रहा था , फिर से आबाद हो गया है | उसके बाद लखनऊ आने पर चन्द्रशेखर जी अपने पुराने सहयोगी ओमप्रकाश श्रीवास्तव के साथ काफी हाउस गये | चन्द्रशेखर जी की आँखे जिन परचितो को ढूढ़ रही थी वे वहाँ नही मिले | इसके बाद चन्द्रशेखर जी वी आई पी गेस्ट हाउस चले गये | काफी हाउस में बैठे लोग व बेयरे भी पूर्व प्रधामंत्री को अचानक अपने बीच पाकर अचम्भित रह गये | कुछ घंटो के बाद जब मैं चन्द्रशेखर जी से मिला तो शिकायत भरे लहजे में कहा की तुम्हारी सुचना पर काफी हाउस गया पर कोई परचित नही मिला | उसके बाद नाम लेकर तमाम परचितो के बारे में पूछते रहे | जब वरिष्ठ पत्रकार विद्यासागर जी के बारे में बताया तो कहने लगे की शाम को उनके घर चला जाए |
विद्यासागर जी के घर चन्द्रशेखर जी काफी हाउस में बिठाये हुए दिनों और मित्रो की चर्चा करते रहे | चन्द्रशेखर जी ने बताया कि दिल्ली में भी वे ब्लिट्ज में जुड़े ए .राघवन व गिरीश माथुर के काका नगर कालोनी में स्थित आवास पर अक्सर जाते थे | ------ क्रमश: आभार प्रदीप कपूर

Thursday, December 7, 2017

काफी हाउस 7-12-17

अपना शहर मगरुवा
कहवाखानो से निकलती थी आम आदमी की आवाज
कारपोरेट ने खतम कर दिया यह संस्कृति
बहुत बार लखनऊ गया घूम नही पाया था | पिछली बार जब मैं लखनऊ गया था तब एक दिन शाम को काफी हाउस में जाकर बैठा काफी पी रहा था, तभी वहाँ पर मगरू भाई बैठे मिल गये एक टेबल पर मैं वहाँ से उठा और उस टेबल पर चला गया | मगरू भाई के टेबल पर जाकर उनका हाल – चाल लिया | हमने उनसे कहा कि लखनऊ के काफी हाउस के बारे में बताये मगरू भाई ने कहा काफी से काफी हाउस बना दत्ता बाबू आज संक्षिप्त बताता हूँ इसके बारे में काफी हॉउस बना मगरू भाई बताने लगे और मेरी कलम चलती रही उनके बातो पर आज आप मित्रो को ले चलता हूँ |
काफी हाउस
-----------------
काफी ( अंग्रेजी ) या कहवा ( अरबी ) संसार के सबसे अधिक लोकप्रिय पेय पदार्थो में तो है ही , काफी हाउस ( जहां बैठकर पीने वालो को तैयार काफी मिलती है ) या कहवाघर कई सौ साल पहले सामजिक सम्पर्क के केंद्र बन चुके थे यहाँ बैठकर लोग गप्प लडाते थे , विविध विषयों पर बहस करते थे , लिखते थे , पढ़ते थे , परस्पर मनोरंजन करते थे | बैठकबाजी अड्डे के रूप में यह परम्परा आज तक चली आ रही है |
काफी और काफी हाउस का इतिहास बड़ा रोचक है | कहा जाता है कि 9वी शताब्दी ईस्वी में काफी के सुस्ती दूर कर ताजगी देने वाले गुण का अरबो को पता चला और शीघ्र ही पूरे अरब में उसका सेवन होने लगा तथा कहवाघर खुलने अलगा | प्राप्त प्रमाणों से पता चलता है कि 16वी शताब्दी में मक्का के कहवाघरो में राजनीतिक चर्चा होने लगी तो इमामो ने मुसलमानों के कहवा पीने पर रोक लगा दी थी | परन्तु कहवा और कहवाघरो की लोकप्रियता बढती गयी | 16वी शताब्दी में दमिश्क ( सीरिया ) और कायरो ( मिस्र ) में कहवाघर खुल गये थे | इसी शताब्दी में टर्की की राजधानी इस्तबुल में भी काफी का प्रवेश हो चूका था |
योरोप में काफी का प्रवेश टर्की के माध्यम से 16 वी शताब्दी में हुआ था | काफी को वास्तविक लोकप्रियता मिली लन्दन के ‘’काफी घरो “ coffee house ‘’ में जो राजनीतिक , सामजिक और साहित्यिक चर्चा के केंद्र बन गये | यहाँ काफी के गर्म प्यालो से लन्दन के विचारशील , दार्शनिक और लेखक अपना शरीर गरमाने के साथ अपनी जबान की लगाम भी ढीली कर देते थे |
लगभग1652 में लन्दन के सेंत माइकेल्स एली में कार्न्हिल में पहला काफी हाउस स्थापित करने का श्रेय पास्क्वा रोजी (pasqua rosee ) को है |
17 वी शताब्दी में प्रेंच इतिहासकार जीन पारदिन ने लिखा कि यहाँ के कहवाखानो में जहां पर लोग बैठकर न केवल राजनीतिक चर्चा करते थे , वे वहाँ की सरकार के क्रियाकलापों की भी खिचाई करते थे और साथ ही साथ तमाम लोग शतरंज भी खेलते थे | कुछ दरवेश वहाँ खड़े होकर समाज सुधार की बाते करते थे | यही से अवाम के जन समस्याओं से आन्दोलन पैदा होते थे |
लखनऊ में बैठकबाजी की परम्परा
लखनऊ काफी हाउस से मेरा परिचय कराया समाजवादी विचारक खाटी समाजवादी बड़े भाई विनोद कुमार श्रीवास्तव ने मैंने तभी जान लिया था कि यह जगह बैठकबाजो का अड्डा है | मैंने सूना था कि लखनऊ के काफी हॉउस में अमृतलाल नागर , भगवती चरण वर्मा , यशपाल जैसे साहित्यकार और आदरणीय चन्द्रशेखर जी जैसे राजनेताओं का नियमित काफी हाउस आना होता था और घंटो वहाँ बैठकर गंभीर विषयों पर चर्चा करते थे |
बैठकबाजी की बात चली तो यह बताना जरूरी है कि लखनऊ में इसका शगल बहुत पुराना है | नवाबी युग में बैठकबाजी का अड्डा था चडूखाना जहां अफीम के आदि जमा होते थे | चडू अफीम से बना एक गिला प्रदार्थ है जो तम्बाकू की तरह पिया जाता है | अफीम के नशे की विभिन्न स्थितियों में चंडूबाज कल्पनालोक में डूबे बडबडाते , बे पर की उड़ाते रहते थे | झूठी बेसिर – पैर की बातो के लिए अक्सर ‘चडूखाने की गप्प ‘ मुहावरे का उपयोग किया जाता है |
बैठकबाजी का दूसरा अड्डा कहवाखाना ( आधुनिक काफी हॉउस ) हुआ करता था | ऐसा लगता है कि लखनऊ में कहवा का चलन इरान से आया होगा | जहां लखनऊ के नवाबो का मूल स्थान था | लखनऊ के कहवाखाने शिष्ट समाज के बैठकबाजी के अड्डे थे | इनमे दास्तानगो किस्से – कहानिया सुनाया करते थे | इन कहवाखानो का उल्लेख्य उर्दू साहित्य में यत्र –तत्र मिलता है जैसे रंतान् नाथ सरशार का ‘फसांनएआजाद ‘ |
लखनऊ शहर में बैठकबाजी की परम्परा अभी भी चली आ रही है जहां विभिन्न विषयों पर बहस – मुहाब से होते रहते है | आज भी नक्कास , चौक में ''रैड रोज'' चाय की दूकान पर भीड़ लगी रहती है जहां रोज के बैठने वाले एक प्याली चाय पर बहस करते दीख जायेंगे | लखनऊ के भाजपा के वरिष्ठ नेता लालजी टंडन का कहना है कि चौक में राजा ठंडाई की दूकान शाम को काफी हाउस की तरह बैठकबाजी का अड्डा बन जाती थी | राजा ठंडाई की दूकान चौक में चौबत्ती के बीच में थी जहां शाम को खासतौर से तैयार होकर लोग आते थे और नियमित बैठके होती थी |
इसी तरह से अमीनाबाद में अब्दुल्ला होटल भी देर रात तक बैठकबाजी के लिए मशहूर था | संगीत के बादशाह नौशाद ने काफी साल पहले अपनी बातो में चर्चा करते बतया था कि वे और उनके दोस्त अमीन सलोनवी अब्दुल्ला के होटल में बैठते थे | बाद में अमीन सलोनवी के बेटे मोबिन जो स्थानीय पायनियर अखबार में काम करते थे , वहाँ नियमित जाते थे | अवकाश प्राप्त हाईकोर्ट के जज हैदर अब्बास साहब अपने छात्र जीवन और फिर बाद में कांग्रेस लीडर की हैसियत से अपने मित्र पत्रकार सूरज मिश्रा के साथ अब्दुल्ला होटल जाते रहे है | अमीनाबाद में सुन्दर सिंह शर्बत वाले थे जिनकी दूकान भी बैठकबाजी का अड्डा रही है | अमीनाबाद में ही कछेना होटल भी साहित्यकारों की बैठकबाजी का अड्डा रहा है | लखनऊ के पूर्व मेयर व साहित्यकार दाउजी आज भी कछेना में बैठते है | पत्रकार – साहित्यकार स्व अखिलेश मिश्रा भी कछेना में बैठते थे |
कैसरबाग में नेशनल हेराल्ड के आफिस के पास जनता काफी हाउस था जहां पत्रकार , साहित्यकार एवं लेखक बराबर बैठते रहे है | पास ही नजीराबाद में एक जमाने में नेशनल कैप स्टोर था जिसको तिवारी जी व उनकी पत्नी जो अम्मा जी के नाम से जानी जाती थी चलाती थी | यहाँ राजनेताओं के मिलने का अड्डा था | एक जमाने में चन्द्रभानु गुप्ता जी भी यहाँ नियमित रूप से बैठते थे |
हजरतगंज में जहां आजकल साहू सिनेमा है , वहाँ फिल्मिस्तान था और उसके नीचे प्रिंस सिनेमा था | उसी बिल्डिंग में न्यू इंडिया काफी हाउस था जो 50-60 के दशको में लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र व राजनेताओं की बैठकी का केंद्र रहा है |
इन सार्वजनिक अड्डो के अतिरिक्त पत्रकारों तथा राजनेताओं के लिए पंडित नेकराम शर्मा के घर भी बैठकबाजी का अड्डा रहा है | नेकराम शर्मा पार्क रोड पर रहते थे | उनकी दरियादिली का कोई जबाब नही था | उनकी मेहमाननवाजी की किस्से अभी भी मशहूर है |
हजरतगंज में बैठकबाजी का एक और अड्डा था जिसका नाम था बैनबोज रेस्टोरेंट | हजरतगंज के चौराहे पर जहाँ पर आज छंगामल की दूकान है वही बैनबोज था जो ओबराय सरदार जी का था | बेन्बोज की बेकरी काफी मशहूर थी | वहाँ के बने केक दिल्ली में बैठे राजनेताओं के घर पहुचाये जाते थे | भारतीय राजनीत में दखल देने वाले स्व एन डी तिवारी समेत तमाम राजनेता व पत्रकार शाम को बेन्बोज में नियमित बैठते थे | क्रमश:

Monday, November 27, 2017

क्रांतिवीर - मौलाना बरकत – उल्लाह भोपाली 27-11-17

क्रांतिवीर - मौलाना बरकत – उल्लाह भोपाली


''कोई भी देश , जिसके नागरिक मौलाना बरकत उल्लाह जैसे हो बहुत दिनों तक गुलाम नही रह सकता |''


‘’मैंने जीवन भर निष्ठापूर्वक अपने देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया है | मेरा सौभाग्य है की मेरे जीवन राष्ट्र की सेवा में बीता है | और इस जीवन को विदा कहते हुए मुझे एक ही बात का दुःख है कि मेरे प्रयत्न सफल न हो सके | किन्तु मुझे पूरा भरोसा है कि मेरे देश के करोड़ो बहादुर देशवासी , जो ऊर्जा और निष्ठा - विश्वास से परिपूर्ण है , कूच कर रहे है और हमारा देश स्वतंत्र होकर रहेगा | मैं पूरी आस्था के साथ अपने प्रिय देश का भाग्य उनके हाथो में सौप रहा हूँ |’’

और इन शब्दों के साथ विश्वभर में भारत की आजादी कि अलख जगाते हुए उस क्रांतिवीर ने , जिसे उसके देशवासी क्रान्ति का पितामह कहते थे , कैलिफोर्निया की धरती पर प्राण त्याग दिए | सितम्बर 1927 में साठ वर्ष की आयु में | एक समय गदर पार्टी के उपप्रधान रहे विद्वान् देशभक्त मौलाना बरकत उल्लाह की समाधि आज भी कैलिफोर्निया राज्य की राजधानी सैक्रामैंटो के प्रमुख कब्रिस्तान में अपने होने की गवाही दे रहा है |

मृत्यु के समय मौलाना बरकत – उल्लाह ने यह इच्छा जताई थी कि जब देश स्वतंत्र हो जाएगा , तो उनके पार्थिव शरीर को पुन: भारत की पावन भूमि में दफनाया जाए | कहना ना होगा उनकी यह अंतिम इच्छा देश की आजादी के सात दशको से अधिक बीत जाने के बाद भी पूरी नही हो पाई |
मृत्यु से एक दिन पहले ही मैरिवल , कैलिफोर्निया की एक सभा में भाषण करते हुए उन्होंने शोक जताया था कि वे अपने लोगो से तेरह वर्षो से अलग रहे थे |’’ आज जैसे ही मैं अपने चारो और देखता हूँ , तो अपने 1914 के सहकर्मियों को नही देख पा रहा हूँ | कहाँ है वे ? मानव स्वतंत्रता के देवदूत ? बलिदान हो गये या काल कोठरी में अकेले बंद है ? जरुर ऐसे ही होंगे – उन्होंने देशप्रेम का अपराध जो किया है | मैं शायद बचा हूँ अपने देशवासियों की भयावह यातना को कुछ काल और देखने के लिए | मेरे देशवासियों , उन वीरो का हम पर बहुत बड़ा ऋण है | क्या हम चुका पायेंगे ?”’
बीसवी शताब्दी के पहले ढाई दशको में मौलाना बरकत उल्लाह का सम्बन्ध उन सभी प्रवासी भारतीयों संस्थाओं से रहा , जो भारत की स्वतंत्रता के लिए प्रयत्न रहे ‘’गदर पार्टी ‘’ बर्लिन इन्डियन कमेटी ‘ श्याम जी कृष्ण जी वर्मा का इंग्लैण्ड में स्थापित ‘इण्डिया हाउस ‘’ मैडम कामा की पेरिस स्थित संस्था और दक्षिण पूर्वी एशिया रूस आदि – सभी से इस आत्म – निर्वासित देशभक्त का पैतीस वर्षो के प्रवास में सम्पर्क रहा | मुस्लिम – बहुल राष्ट्रों में भारत के प्रति सहानुभूति प्रकट करवाने में तो वे शायद अकेले भारतीय थे |
1867 के आस – पास भोपाल के एक कच्चे घर में उनका जन्म हुआ | वहाँ 1857 के विप्लव के बाद उनके माता पिता उत्तर प्रदेश से आकर बस गये थे | आरम्भिक शिक्षा घर में परम्परागत इस्लामिक पद्धति से हुई | मौलाना को दस वर्ष की आयु में पूरी कुरआन याद हो गयी थी | उन्हें उर्दू और फ़ारसी की शिक्षा भी दी गयी | पर मौलाना की रूचि अंग्रेजी व्यवहारिक ज्ञान प्राप्त करने में थी | भोपाल में कोई सुविधा उसकी न थी | हाँ इसी बीच उनका सम्पर्क सैयद ज्लालुद्धीन अफगानी से हुआ , जो भारत में ब्रिटिश शासन के कट्टर विरोधी थे |
1883 की जनवरी की एक रात को मौलाना बिना किसी को बताये घर से गायब हो गये | अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए वे जबलपुर गये और वहाँ से असंतुष्ट होकर मुंबई | वहाँ एक हाई स्कूल में प्रवेश पाकर अगले चार वर्षो तक रहे |
इस बात से प्रेरित होकर ही एक अंग्रेज ने इस्लाम कबूल कर लिया है , वे इंग्लैण्ड चले गये | वहाँ उन्होंने अरबी फारसी पढाना शुरू किया , उन भारतीयों को जो इन्डियन सिविल सर्विस की तैयारी कर रहे थे | साथ ही उन्होंने अंग्रेजी भाषा और साहित्य का गहन अध्ययन किया और वे इतने पारंगत हो गये की ‘ लन्दन टाइम्स ‘ में लेख लिखने लगे | इसके फलस्वरूप उन्हें लिवरपूल के मुस्लिम ईस्टीटयूट में अरबी पढ़ाने के लिए निमंत्रण मिला | उसी संस्थान की दो पत्रिकाओं में – क्रीसैनट ‘ और ''‘इस्लामिक वर्ल्ड ''‘ में लिखना प्रारम्भ किया , जहां उन्होंने एक और सार्वभौमिक इस्लाम की कल्पना को जन्म दिया और दूसरे भारत की स्वतंत्रता को अपने जीवन का केंद्र बनाया | उन्होंने भारतीय मुसलमानों को कांग्रेस का सदस्य बनने का आग्रह किया – ब्रिटिश साम्राज्वाद से लड़ने के लिए | मुस्लिम राष्ट्रों से भारत की आजादी में सहायक होने को कहा | अपने भाषणों में वे ब्रिटेन की ‘’फूट डालो और राज करो ‘'' की नीति की भर्त्सना करने लगे | ब्रिटेन द्वारा भारत के शोषण का कच्चा चिठ्ठा खोलने लगे | उन्हें ब्रिटेन में रहकर इस बात का तीव्र आभास हुआ कि भारत के लिए आर्थिक प्रगति करने के लिए स्वतंत्र होने की बात अनिवार्य है | और जब ब्रिटिश सरकार ने मौलाना की गतिविधियों पर नजर रखने लगी तो मौलाना को अमरीका से निमंत्रण मिला – अमरीका में जैसे मौलाना को पहली बार ताज़ी हंवा में साँस लेने का अनुभव हुआ | वहाँ उन्होंने जमकर भारत की स्वतंत्रता विषयक लेख लिखने लगे | उन्होंने 1904 के मुंबई कांग्रेस अधिवेशन में प्रतिनिधि के रूप में भाग लेने वाले मौलाना हसरत मोहानी की पत्रिका ‘ ''उर्दू – ए-मोअल्ला ''‘ में लेख लिखे |

मौलाना के लेखो को अंतरराष्ट्रीय प्रशस्ति मिली | उन्हें इस्ताम्बुल जाने का निमत्रण मिला | डेढ़ साल वहाँ रहकर वे जापान गये | वहाँ के प्रमुख पत्रों में लिखने के परिणाम स्वरूप उन्हें सम्राट ने टोकियो विश्व विद्यालय में उर्दू का प्रोफ़ेसर बना दिया ( उसी आधार पर हाल ही में जापान में हिंदी –शिक्षण की शताब्दी मनाई थी ) वहाँ जमने के बाद उन्होंने ‘''इस्लामिक फ्रेटरनिटी ‘’ पत्र निकाला | साथ ही साथ वहाँ बसे प्रवासी भारतीयों को संगठित करना शुरू किया | उससे ब्रिटेन की नीद हराम होनी शरू हो गयी , तो अंग्रेजो ने दबाव डालकर सम्राट द्वारा शालीनता से जापान छोड़ने की बात कहलवाई |
1922 में वे फ़्रांस आ गये | ''‘एल इन्कलाब'' ‘ के सम्पादक बने | पर यहाँ भी ब्रिटेन ने दबाव देना शुरू किया | उन्हें देश छोड़ना पडा |
वे दुबारा अमरीका गये | वहाँ तभी ‘गदर पार्टी ‘’ की स्थापना हुई थी | वे उसमे शामिल हो गये | वे पार्टी के उपप्रधान चुने गये और उर्दू ‘गदर’ के सम्पादक बनाये गये | वहाँ जब ब्रिटिश साम्राज्य के गुर्गो ने प्रवासियों को हिन्दू - सिख मुसलमान के नाम से भिड़ाना चाहा , तो मौलाना बरकत - उल्लाह , भाई भगवान सिंह और रामचन्द्र ने उनका षड्यंत्र नही पनपने दिया | प्रथम युद्ध की घोषणा के बाद जब प्रवासी भारतीय स्वदेश आने शुरू हो गये – भारत की आजादी का बिगुल बजाने – तो इन्ही तीनो नेताओं ने उनके जहाजो के डैक पर खड़ा होकर जोशीले भाषण देकर उन्हें विदा किया |
इस बात का एहसास होने पर कि भारत के स्वतंत्र संग्राम में मित्र राष्ट्र की सहायता बहुत जरूरी है , मौलाना को कई बार विभिन्न देशो में भेजा गया | वे टर्की गये जर्मनी गये | जर्मनी में बर्लिन कमेटी शिद्दत से जर्मन सरकार से बात कर रही थी और भारतीय युद्धबंदियो को ब्रिटेन के विरोध में लड़ने के लिए संगठित कर रही थी | इन योजनाओं में मौलाना की भूमिका अहम् थी | इंडो – जर्मन – मिशन के तहत मौलाना अनेक देशो में गये | इन्ही यात्राओं के मध्य अफगानिस्तान में 29 अक्तूबर , 1915 को प्रवास ( निष्कासन) में भारतीय राष्ट्रीय सरकार का गठन हुआ जिसमे राजा महेंद्र प्रताप सिंह राष्ट्रपति और बरकत उल्लाह प्रधानमन्त्री बनाये गये | उस राष्ट्रीय सरकार ने विभिन्न देशो में अपने प्रतिनिधि मंडल भेजे | 1919 में मौलाना इसी सरकार के प्रधानमन्त्री की हैसियत से सोवियत यूनियन गये | लेनिन से मिले | लेनिन मौलाना और उनके विश्व सम्बन्धी राजनीतिक विश्लेष्ण से बहुत प्रभावित हुए | वे चाहते थे कि मौलाना सोवियत यूनियन में रहे | पर अन्य देश – विशेषत अरब राष्ट्र उनसे परामर्श चाहते थे | खिलाफत आन्दोलन में उनकी प्रमुख भूमिका रही |
उन्होंने तक ''‘ऐल- इसलाह ‘’ नाम का पत्र निकाला पेरिस में | मुसोलीन सहित अनेक राष्ट्र नेताओं से वे मिले | ‘गदर पार्टी “ के प्रतिनिधि के रूप में उन्होंने ब्रसल्स ( वैल्जियम ) में साम्राज्य वाद – विरोधी सम्मेलन में भाग लिया | वहाँ उनकी भेंट जवाहरलाल नेहरु से हुई | नेहरु ने उनकी निष्ठा और बौद्धिक चेतना से बहुत प्रभावित हुए | उन्होंने कहा , ''कोई भी देश , जिसके नागरिक मौलाना बरकत उल्लाह जैसे हो बहुत दिनों तक गुलाम नही रह सकता |''
यही समय था , जब गदर पार्टी ने अपने वार्षिक अधिवेशन में भाग लेने के लिए उन्हें कैलिफोर्निया बुलाया | उत्साह भरी भीडो को न्यूयार्क , शिकागो डिट्रोयट आदि नगरो में सम्बोधित करके वे कैलिफोर्निया पहुचे | वहाँ उनका स्वागत घर लौटे हुए नायक की भाँती हुआ | किन्तु शोक , वहीँ अपने अंतिम भाषण के साथ उन्होंने प्राण त्याग दिए |
भारतीत स्वतंत्रता और अमरीका में भारतीय अधिकारों की प्रबल समर्थक एग्नेस स्मेडले ने कहा , ‘’ उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के सपने में कभी भी अपना विश्वास नही खोया और अंतिम क्षण तक वे अपनी देशसेवा की सौगंध के प्रति निष्ठ रहे | एक पल के लिए भी वे अपने ध्येय और चुने मार्ग से विचलित नही हुए |''

सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार समीक्षक --- आभार आजादी या मौत पुस्तक से

Saturday, November 25, 2017

कतारे - 26-11-17

कतारे
लम्बी कतारे
बेरोजगारों की कतारे
गैस की कतारे
रोटी की कतारे
कभी राशन की कतारे
लम्बी कतारों की फ़ौज
कभी आवेदनों की कतारे
जहां देखिये वही कतारे
मंत्री के घर दलालों की कतारे
संतरी के यहाँ कतारे
अधिकारियों के यहाँ चापलूसों की कतारे
कभी न खतम होने वाली कतरे
क्या खत्म होगी ?
कतारे - कतरे - कतारे ---- सुनील दत्ता

Tuesday, November 21, 2017

किसानो का दर्द 21-11-17



किसानो का दर्द


बीते दो दशको में 3 लाख 21 हजार 428 किसान आत्महत्या कर चुके है |


4 अक्तूबर के अम्र उजाला में भाजपा सांसद वरुण गांधी का लेख ‘’कर्ज में डूबे  किसानो का दर्द शीर्षक के साथ प्रकाशित लेख कुछ तथ्यों को जरुर उजागर करता है | उन्होंने अपने लेख में ग्रामीण कर्ज के बारे में पंजाब विश्व विद्यालय के तीन साल पुराने अध्ययन को प्रस्तुत किया है | उसमे पंजाब के बड़े किसानो पर ( 10 हेक्टेयर या 25 एकड़ से ज्यादा जोत वाले बड़े किसानो पर ) कर्ज उनकी आय का 0.26% है | जबकि माध्यम दर्जे के ( 4 से 10 ) हेक्टेयर की जोत वाला ) किसानो पर कर्ज उनकी आय का 0.34% है | लेकिन छोटे दर्जे के ( 1-2 हेक्टेयर जोत वाले किसानो पर तथा सीमांत किसानो  एक हेक्टेयर से कम जोत के किसानो पर कर्ज का बोझ कही ज्यादा है | वह उनकी आय का 1.42% 0.94% है ! इन पर कर्ज और ब्याज का बोझ और ज्यादा इसलिए भी है कि इनके कर्ज का आधे से अधिक हिस्सा गैर बैंकिंग क्षेत्र अर्थात प्राइवेट महाजनों और माइक्रोफाइनेंस कम्पनियों आदि से लिया गया है |
कर्ज के इसी बोझ का नतीजा किसानो की आत्महत्याओं के रूप में आता है | प्रकाशित लेख में किसानो की आत्महत्या के बारे में यह सूचना भी दी है कि बीते दो दशको में 3 लाख 21 हजार 428 किसान आत्महत्या कर चुके है | आत्महत्या और कर्ज के बोझ के कारणों पर चर्चा करते हुए उन्होंने सीमित सिचाई सुविधा बारिश पर निर्भरता बाढ़ क्षेत्र एवं उपज में वृद्दि के वावजूद कृषि आयात में बढ़ोत्तरी खाद्यान्नो की कीमत में किसान के लागत की तुलना में गिरावट कृषि के आवश्यक संसधानो का साधारण किसानो की पहुचं के बहार होने आदि को बताया है | बढती लागत के सन्दर्भ में उन्होंने उर्वरक एवं कीटनाशक दवाओं तथा आधुनिक बीज की ऊँची कीमत को भी प्रमुखता से उठाया है |
इसके अलावा सांसद वरुण गांधी ने पहले की और अब की सरकारी नीति के अंतर को बताते हुए भी लिखा है कि ‘’ भारतीय कृषि नीति शुरू से खाद व बीज पे सब्सिडी देकर लागत कम करने तथा उत्पादन एवं समर्थन मूल्य के जरिये न्यूनतम आय की गारंटी प्रदान करने की नीति थी | लेकिन वह नीति धीरे धीरे करके अपनी उपयोगिता खो चुकी है | सब्सिडी घटाने या खत्म किये जाने के साथ देश का कृषि संसधान धीरे धीरे नियंत्रण मुक्त होता जा रहा है |
बजट घटा  कर कम करने के प्रयासों में सिचाई बाढ़ नियंत्रण के उपायों और ज्यादा उपज देने वाली फसलो पर किया जाता रहा सरकारी निवेश प्रभावित हुआ है |
कृषि क्षेत्र को बाजार के भरोसे छोड़ दिया गया है , जिसके लिए वह अभी तैयार नही है | ऐसे में किसानो के लिए अपना अस्तित्व बचाना मुश्किल होता जा रहा है |

लेख के अंतिम हिस्से में उन्होंने किसानो की मुश्किलों को कम करने के प्रयासों को गिनाया है | उदाहरण उन्होंने कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक द्वारा ट्यूबवेळ सिचाई , कृषि मशीनीकरण और सहायक गतिविधियों की विशेष मदद दिए जाने की , 1990 के बाद से कई बार कृषि ऋण माफ़ी दिए जाने की ग्रामीण सरचनात्मक विकास को तेज किये जाने की 1999 से किसान क्रेडिट कार्ड शुरू किये जाने अदि की चर्चा किया है | छोटे व सीमान्त किसानो के लिए कृषि उपकरणों खाद और कीटनाशको की समस्याओं के समाधान के लिए कृषि उपकरणों खाद और कीटनाशको की खरीद पर ज्यादा सब्सिडी देने का सुझाव दिया है | इसके अलावा मनरेगा का दायरा बढ़ाकर सीमान्त किसानो के खेत की जुताई के भुगतान के जरिये भी उनकी कृषि लागत को घटाने का सुझाव दिया है |

भाजपा सांसद की राय अन्य कृषि विशेषज्ञोव प्रचार माध्यमी विद्वानों से इस माने में भिन्न एवं समर्थन योग्य है कि उन्होंने अपने लेख में बढती कृषि लागत सरकारी निवेश व सब्सिडी को भी किसानो के बढ़ते कर्ज व दर्द के प्रमुख कारण के रूप में पेश किया है |
साथ ही उन्होंने अपने सुझाव में कृषि लागत मूल्य को घटाने का भी सुझाव प्रमुखता से उठाया है | लेकिन अपने लेख में उन्होंने यह बात नही उठाया कि उनके सुझावों के विपरीत कृषि के लागत को लगातार बढाने तथा बजट घाटा कम करने के नाम पर कृषि सब्सिडी को सभी सरकारों द्वारा घटाने का काम क्यों किया जाता रहा है ? साथ ही कृषि में सरकारी निवेश को भी लगातार क्यों घटाया जाता रहा है ?
उन्होंने खुद कहा कि कृषि क्षेत्र को सरकारी सहायता के साथ सरकारी नियंत्रण द्वारा संचालित करने की जगह उसे बाजार के भरोसे छोड़ दिया गया है |
सवाल है कि कृषि नीति को किसानो को न्यूनतम आय की गारंटी देने वाली नीति को क्यों छोड़ दिया गया ?
वरुण गांधी ने इसका जबाब एक लाइन में लिखा है कि यह नीति धीरे धीरे अपनी उपयोगिता खो चुकी है | इस जबाब को तो कोई माने मतलब नही है | क्योकि वह कृषि नीति अपनी उपयोगिता अपने आप कैसे खो सकती है ? क्या अब कृषि से न्यूनतम आय की गारंटी की कोई जरूरत किसानो को नही रह गयी है ? अगर उस गारंटी की जरूरत है तो किसानो के लिए खासकर छोटे व सीमान्त किसानो को खेती एवं जीवन की गारंटी के लिए न्यूनतम तथा उससे थोड़ी बेहतर आय की गारंटी की आवश्यकता जरुर है | इसे पूर्ववर्ती सरकारे भी कबुलती रही है | फिर वर्तमान सरकार का एक प्रमुख एजेंडा किसानो की आय को दोगुना करने के रूप में प्रचारित किया जाता रहा है | तब आखिर वह कौन है ? , जिसने अब किसानो की न्यूनतम आय की गारंटी वाली नीतियों की उपयोगिता को समाप्त करके उसमे बदलाव किया है ?

लेखक ने इस सवाल को उठाने से परहेज किया है | उन्होंने 1990 –95 से आती रही सभी सरकारों द्वारा कृषि नीति में किये गये परिवर्तन की कोई चर्चा ही नही किया है | जबकि उन्ही नीतियों एवं डंकल प्रस्ताव के जरिये खेती की लागत में वृद्धि के साथ सरकारी निवेश एवं सब्सिडी में कटौती की जाती रही है | कृषि क्षेत्र व किसानो को बाजार के सहारे छोड़ा जाता रहा है | कृषि उत्पादों के खासकर खाद्यान्नो में मामले में देश को आत्मनिर्भर बनाने के घोषित उद्देश्य को अघोषित रूप में उपेक्षित किया गया है | आधुनिक बीजो को सरकारों द्वारा सस्ती दर पर मुहैया कराने की जगह उसका सर्वेसर्वा अधिकार बहुराष्ट्रीय कम्पनियों एवं राष्ट्रीय स्तर की बीज कम्पनियों को दिया जाता रहा है | सार्वजनिक सिचाई की नीति को किसानो के अपने निजी संसधान से सिचाई की नीति के जरिये बदला जाता रहा है | सरकारी मूल्य और बाजार पर सरकारी नियंत्रण के साथ कृषि उत्पादों की खरीद की जगह किसानो को अपने उत्पादों को बाजार में गिरते भाव पर बेचने के लिए बाध्य किया जाता रहा है | न्यूनतम सरकारी मूल्य को भी गेहूँ , चावल , गन्ने की भी न्यूनतम खरीद के रूप में निरंतर निष्प्रभावी किया जाता रहा है |

अन्य रूपों में देश के किसानो का संकट पिछले 20– 25 सालो से तेजी से बढ़ता रहा है | यह संकट देश व विदेश की धनाढ्य कम्पनियों के उदारवादी व निजिवादी छुटो अधिकारों को खुलेआम बढ़ावा देने वाली नीतियों के परिणाम स्वरूप बाधा है | फिर 1995 में डंकल प्रस्ताव के जरिये कृषि क्षेत्र को वैश्विक व्यापार संगठन के अंतर्गत लाने और उसके निर्देशों को लागू करते जाने के बाद और ज्यादा समस्या बढ़ी है | 1995 से किसानो की बढती आत्महत्याए उपरोक्त आर्थिक नीतियों एवं डंकल प्रस्ताव के परिणामो को ही परिलक्षित करती है | इन्ही नीतियों के फलस्वरूप जहां कृषि लागत के साधनों मशीनों मालो को बनाने वाली तथा कृषि उत्पादों के इस्तेमाल से बाजारी उत्पादों को बनाने में लगीधनाढ्य कम्पनियों कृषि क्षेत्र से अधिकाधिक लाभ कमाती रही है | वही आम किसान संकट ग्रस्त होते रहे है | इसीलिए कोई कर्ज माफ़ी या बीमा सुरक्षा अथवा कोई राहतकारी उपाय किसानो को स्थायी राहत देने में सफल नही हुई | वे कर्ज में डूबे किसानो के दर्द का निवारण कदापि नही कर सकते | क्योकि ये राहतकारी उपाय बीज खाद दवा कृषि उपकरण आदि की देशी विदेशी कम्पनियों को कृषि एवं किसान के शोषण से दोहन से अधिकाधिक लाभ कमाने पर रोक नही लगा सकते | कृषि उत्पादों के आयात निर्यात से लेकर देश के कृषि बाजार पर धनाढ्य कम्पनियों को अपना नियंत्रण बढाने से रोक नही सकते | फलस्वरूप किसानो को उनके उत्पादों की उचित या लागत के अनुरूप समुचित मूल्य  भाव भी नही दिला सकते | किसानो को बढ़ते घाटे बढ़ते कर्ज और बढती आत्महत्याओं से छुटकारा भी नही दिला सकते |



सुनील दत्ता स्वतंत्र पत्रकार समीक्षक

Friday, November 17, 2017

कुपोषण और उसकी कुंजी 17-11-2017


कुपोषण और उसकी कुंजी

भूख के विरुद्ध भात के लिए --- रात के विरुद्ध प्रात के लिए



16 अक्तूबर के हिंदी दैनिक ‘हिन्दुस्तान ‘ में जाने माने कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा का 'देश में बढ़ते कुपोषण' पर लेख प्रकाशित हुआ है | कुपोषण की कुंजी शीर्षक के साथ प्रकाशित लेख के नीचे लेखक ने निष्कर्ष के रूप में लिखा है , ‘ गरीबी , भूख और कुपोषण से लड़ाई तब तक नही जीती जा सकती , जब तक कृषि पर पर्याप्त ध्यान नही दिया जाता ‘|

अपने लेख में उन्होंने भूख के शिकार लोगो के बारे में यह तथ्य प्रस्तुत किया है कि संयुकत राष्ट्र एवं खाद्द सगठन की सूचनाओं के अनुसार पिछले 15 वर्षो में पहली बार भूख का आंकडा बढ़ा है | भारत में भी भूख से पीडितो की बढती संख्या का परिलक्षण वैश्विक भूख सूचकांक में भारत के तीन पायदान नीचे खिसकने के रूप में शामिल हो गया है | एक वर्ष पहले 119 देशो के भूख सूचकांक में भारत 97 वे नम्बर पर था , जबकि इस वर्ष के सूचकांक में भारत नीचे खिसक कर 100 वे नम्बर पर पहुच गया है | लेखक ने भूख से लड़ने के मामले में भारत की शर्मनाक तस्वीर के बारे में लिखा है कि पाकिस्तान को छोड़कर दक्षिण एशिया के तमाम देशो का प्रदर्शन भारत से अच्छा रहा है | सूचकांक में भारत के 100 वे और पाकिस्तान के 106 वे पायदान से कही उपर चीन 29 वे नेपाल 72 वे म्यामार 77 वे श्रीलंका 84 वे और बांग्लादेश 88 वे पायदान पर है | 12 साल पहले 2006 में जब यह पहली बार यह सूची बनी थी , तब भी भारत 97 वे पायदान पर था | जाहिर है कि12 साल के बाद भी हम वही खड़े है और पिछले एक साल में हम नीचे खिसक कर 100 वे पायदान पर आ गये है | ... इन 12 सालो में देश का सकल घरेलू उत्पादन औसतन 8% से ज्यादा बढा है फिर भी देश में भूख की समस्या बढ़ी है | ,... देश के 21% से अधिक बच्चे कुपोषित है | राष्ट्रीय पोषण निगरानी ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण भारत के खान – पान में भी गिरावट आ गयी है | 40 साल पहले की तुलना में अब खाद्यानो में प्रोटीन व अन्य घटकों में कमी आ गयी है |
सही है कि भूख से लड़ना एक जटिल एवं चुनौतीपूर्ण काम है , मगर यह असम्भव भी नही है | गरीबी - भूख और कुपोषण पर पर्याप्त ध्यान नही दिया जाता | क्योकि भारतीय अर्थशास्त्री नीति निर्माता और नौकरशाह बाजार के सुधारों के लिए प्रतिबद्ध है | कृषि व सामाजिक क्षेत्र में निवेश को जानबूझ कर कम करते जा रहे है | अगर हम चाहते है कि 2022 तक देश में कोई भूखा न रहे तो हमे कृषि में सार्वजनिक निवेश को बढावा देकर खेती –बाड़ी को फिर से ज़िंदा करना होगा |

उनके लेख के उपरोक्त उद्धरण में आप देख सकते है कि लेखक ने देश में बढती भुखमरी की तस्वीर पेश करने के साथ उसके लिए देश के नीति निर्माताओं अर्थशास्त्रियो और नौकरशाहों को जिम्मेदार ठहराया है | उनका बाजार के सुधार के लिए प्रतिबद्ध बताने के साथ उसे कृषि व सामाजिक क्षेत्र में जानबूझ कर सरकारी निवेश कम करने खेती किसानी को बेजान करने तथा भुखमरी व कुपोषण को बढाने का कारण बताया है | सवाल है कि अगर वे जानबूझ कर यह काम कर रहे है जैसा की वे कर भी रहे है तो वे उसे छोड़ेंगे क्यों ? फिर उससे ज्यादा अहम् सवाल यह है कि नीति निर्माताओं नौकरशाहों द्वारा कुपोषण व भुखमरी को उपेक्षित करने या बढावा देने के लिए किन नीतियों को लागू किया जाता रहा है ? उनके गुण चरित्र क्या है ? और वे नीतिया राष्ट्र समाज को बहुसंख्यक हिस्से में भूख एवं कुपोषण को बढ़ा क्यो और कैसे रहे है ?

इन प्रश्नों का समुचित उत्तर जाने बिना बढ़ते भूख एवं भुखमरी की समस्या का समाधान प्रस्तुत करना सम्भव नही है |

विडम्बना यह है कि जन समस्याओं पर खासकर कृषि समस्याओं पर प्रचार माध्यमो में लिखने वाले देविंदर शर्मा जी जैसे लेखक भी इन प्रश्नों को नजरअंदाज कर के अपना सुझाव प्रस्तुत करते रहते है | इस लेख में भी शर्मा जी ने ऐसा ही सुझाव दिया है | उन्होंने इस लेख में भी प्रस्तुत सवालों से कतराते हुए सुझाव प्रस्तुत कर दिया है कि ‘ गरीबी , भूख और कुपोषण से लड़ाई नही जीती जा सकती जब तक की कृषि पर पर्याप्त ध्यान नही दिया जाता |’ कृषि पर सामजिक निवेश को बढाकर खेती बाड़ी को पुन: ज़िंदा नही किया जाता |’

इस बात से लेखक अनभिज्ञ नही हो सकते की पिछले 20 – 25 सालो से देश में लागू होती रही अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक नीतियों एवं प्रस्तावों के परिणाम स्वरूप ही कृषि विकास पर अपर्याप्त या आवश्यकता से बहुत कम ध्यान दिया जाता रहा है | कृषि तथा कुटीर एवं लघु उद्योग के साथ जनसाधारण की शिक्षा , स्वास्थ जैसी आवश्यक सेवाओं में सार्वजनिक निवेश को निरंतर घटाया जाता रहा है | यह काम किसी एक पार्टी की सरकार द्वारा नही बल्कि केंद्र व प्रान्तों की सत्ता सरकार में बैठने वाली सभी पार्टियों द्वारा किया जाता रहा है | फिर देविन्द्र शर्मा जैसे जनहित तथा कृषि व किसान हित के चिंतको , विचारको द्वारा भी इन नीतियों का विरोध नही किया जाता रहा | यही स्थिति नामी – गिरामी किसान संगठनो की भी रही है | इस विरोध के अभाव में भी कृषि व किसान विरोधी अंतर्राष्ट्रीय व राष्ट्रीय नीतियों प्रस्तावों को केंद्र व प्रान्तों की सभी सरकारों द्वारा चरण दर चरण आगे बढाया जाता रहा | कृषि क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले मालो – सामानों , मशीनों के उत्पादों के बिक्री बाजार से जुडी औद्योगिक एवं व्यापारिक कम्पनियों की कृषि क्षेत्र में घुसपैठ व लूट को बढ़ाया जाता रहा | साथ ही किसानो के छूटो व अधिकारों को काटा - घटाया भी जाता रहा | सरकारी निवेश को घटाते जाने के साथ राष्ट्र में खाद्यानो का भी विदेशी आयात का यहाँ तातक की गेहूं का भी आयात बढ़ाया जाता रहा | खाद्यान्नो के गिरते राष्ट्रीय उत्पादन – उसके बढ़ते निर्यात और फिर उसकी कमी को प्रचारित करके बढ़ाया जा रहा आयात देश में कुपोषण और भुखमरी को दूर नही होने देगा | वर्तमान दौर की वैश्विक नीतियों के ये परिलक्षण व परिणाम अपरिहार्य है | आम किसान इन परिणामो को भले ही न जानता हो , लेकिन हमारे विद्वान् बुद्धिजीवियों लेखको को इस बात की बखूबी जानकारी है | इसके वावजूद वे इसे अपनी चर्चा तक में जगह नही देते है | वे इन नीतियों को लागू करने वाले राजनितिज्ञो , नौकरशाहों को इन नीतियों के विपरीत सरकारी निवेश का सुझाव देते रहते है | इसे ठीक नही माना जा सकता | इसे किसी संज्ञान व्यक्ति का ईमानदारी भरा सुझाव नही माना जा सकता | यह सुझाव केवल तभी वास्तविक एवं ईमानदारी भरा हो सकता है , जब कोई लेखक देश के जनसाधारण श्रमजीवी हिस्से को भूख और कुपोषण के तथ्यों एवं उनके कारणों और कारको के बारे में बताने के साथ ही उन्हें इस बात के लिए भी सचेत करे ककि देश की सभी सत्ताधारी पार्टियों एवं नौकरशाहों अब इन नीतियों को बदलने वाले नही है | कृषि में सार्वजनिक निवेश बढाने वाले तथा खाद्यान्न उत्पादन में देश को आत्मनिर्भर बनाने वाले नही है | देश के जनसाधारण में बढती बेरोजगारी मंहगाई को , कुपोषण व भुखमरी को दूर करने वाले नही है |
इस सच्चाई को देखते समझते हुए अपनी व्यापक बुनियादी समस्याओं , संकटो के लिए आगे आना आवश्यक हो गया है आम आदमी को | बढ़ते कुपोषण व भुखमरी के विरुद्ध कम से कम इन नीतियों का विरोध करना अनिवार्य हो गया है | जनहित की मांगो के साथ इन नीतियों का संगठित विरोध अपरिहार्य हो गया है | वैश्विक नीतियों के विरोध के साथ वैश्विक साम्राज्यी लूट के सम्बन्धो को तोड़ना भी अपरिहार्य हो चला है |

सुनील दत्ता – स्वतंत्र पत्रकार – समीक्षक आभार – चर्चा आजकल से

Thursday, November 2, 2017

अनेकता के साथ एकता 1-11-17



सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर हमला दरअसल कहा से

अनेकता के साथ एकता


सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को मुख्यत भा ज पा एवं अन्य हिंदूवादी सगठनों द्वारा उठाया जाता रहा है | वे इसे देश को मातश्भूमि की देवी के रूप में स्वीकार करने , भारत माँ की जय जयकार करने देश की प्राचीन धार्मिक एवं सामाजिक मान्यताओं को राष्ट्रीयता की पहचान के रूप में अपनाने विदेशी धर्म व संस्कृति को ( उदाहरण इस्लाम व इसाई धर्म को ) इस राष्ट्र के लिए विजातीय मानने आदि के रूप में प्रस्तुत करते है | सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा के प्रस्तुतकर्ताओ द्वारा इसे मुख्यत: इस्लाम धर्मावलम्बी आक्रमणकारियों द्वारा हिन्दू धर्म व समाज की संस्कृति को पहुचाई गयी क्षति और उसके पुनरुथान के रूप में प्रस्तुत करते आ रहे है |
विदेशी आक्रमणकारियों और विजातीय धर्मावलम्बियों द्वारा मध्य युग में किये जाते रहे धार्मिक सांस्कृतिक हमलो से इसी देश में नही बल्कि अन्य देशो में भी की गयी धार्मिक सामाजिक सांस्कृतिक क्षतियो से इनकार नही किया जा सकता | लेकिन यह काम केवल विदेशी धर्मावलम्बियों द्वारा ही नही बल्कि देश की सीमा के भीतर भी भिन्न भिन्न धर्मावलम्बियों द्वारा किया जाता रहा है | उदाहरण इस देश में हिन्दू धर्म और बौद्ध धर्मानुयायियो के आपसी संघर्षो में भी एक दुसरे को धार्मिक एवं सांस्कृतिक रूप से क्षति पहुचाई जाती रही है |
फिर इस सन्दर्भ में मुख्य सवाल तो यह है कि क्या आधुनिक काल के मध्य युग के विभिन्न धर्मावलम्बियों का वह प्रभाव प्रभुत्व बचा रह पाया है ?या वर्तमान युग में उन सभी के प्रभाव व प्रभुत्व को घटाने तथा उन सभी प्राचीन एवं मध्ययुगीन संस्कृति को निरंतर क्षति पहुचाने वाली कोई अन्य शक्ति ही सर्वाधिक प्रभावशाली शक्ति बन गयी है |

इस सच्चाई से इनकार नही किया जा सकता की ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के आगमन और कम्पनी व्यापार एवं राज की स्थापना के बाद यहाँ पर प्राचीन एवं मध्य युग से रह रहे सभी धर्मावलम्बियों द्वारा अंग्रेजी धर्म व संस्कृति के बढ़ते प्रभाव प्रभुत्व के खतरे को महसूस किया जाने लगा था | 1857 के विद्रोह में हिन्दुओ मुसलमानों द्वारा इस खतरे के चलते भी राजनितिक एकजुटता स्थापित हुई थी | विडम्बना यह है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पैरोकार मध्ययुग के सांस्कृतिक खंडहरों को तो देख लेते है उसकी चर्चा और उसका प्रचार भी करते है | लेकिन आधुनिक युग की व्यापारवादी बाजारवादी संस्कृति के बढ़ते फैलाव व हमले को अपनी चर्चा का मुद्दा नही बनाते है | या फिर उस पर बहुत ही कम चर्चा करते है |
लेकिन वर्तमान दौर की बाजारवादी संस्कृति के प्रति बेरुखी या उदासीनता से तो इस राष्ट्र की प्राचीन संस्कृति या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बचे रह पाने की कोई गुंजाइश ही नही बचती | इसलिए यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और उसकी पक्षधरता इस राष्ट्र में हिन्दुओ मुसलमानों के बीच धार्मिक साम्प्रदायिक विरोध को बढ़ाने का हथकंडा तो बन सकता है मगर वह राष्ट्र पर होने वाले सांस्कृतिक हमले को रोक नही सकता | अमेरिका इंग्लैण्ड जैसे विजातीय धर्म व संस्कृति वाले राष्ट्रों के निरंतर बढ़ते रहे आर्थिक राजनितिक सम्बन्धो , प्रभावों के चलते इस देश की संस्कृति व सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का बचाव कदापि नही कर सकता | अब जहाँ तक इस राष्ट्र व समाज के ही अभिन्न हिस्से के रूप में मौजूद इस्लाम या इसाई धर्मावलम्बियों की बात है , तो मध्य युग में हिन्दू धर्म संस्कृति की क्षति के लिए उन धर्मावलम्बियों की आज की पीढ़ी को कही से भी जिम्मेदार नही ठराया जा सकता | मगर उनके द्वारा मध्ययुगीन सधर्मी शासको का पक्ष पोषण करना भी न्याय संगत नही है | उसकी जगह उनके द्वारा भी मध्य युग के आम चलन  के अनुसार मुस्लिम शासको द्वारा यहाँ के हिन्दुओ के साथ किये गये धार्मिक उत्पीडन को स्वीकारना उचित भी है न्याय संगत भी  इसी तरह से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अंतर्गत इस राष्ट्र को अपनी मातृभूमि मानने इसके साथ अपनापन रखने की बात तो एकदम ठीक है | इसकी भौतिक एवं भावनात्मक आवश्यकता से इनकार भी नही किया जा सकता | लेकिन इसकी सामाजिक अभिव्यक्ति के लिए भारत माता की जय या वन्देमातरम के नारे या ऐसे नारों का दबाव डालना उचित नही माना जा सकता | ऐसे दबावों से लोगो में राष्ट्र व राष्ट्रीय संस्कृति के प्रति प्रेम की भावना नही पैदा की जा सकती |


उसकी जगह पर स्वतंत्रता आन्दोलन के दौर में प्रचलित हुए और सर्वमान्य बने ‘’ जय हिन्द ‘’ जैसे अभिवादन को स्वीकारने में शायद ही कोई एतराज करे | किसी के राष्ट्रिय प्रेम को शब्दों के जरिये नापना ही गलत है | न तो इन शब्दों को न बोलने वालो को राष्ट्र विरोधी कहा जा सकता है और न ही इन्हें बोलने वाले सभी लोगो को राष्ट्रवादी , राष्ट्रप्रेमी माना जा सकता है |  यही बात राष्ट्र की प्राचीन सामजिक मान्यताओं उदाहरण गाय , गंगा से जुडी मान्यताओं के बारे में भी कही जा सकती है | 1947 से प्रचलित अनेकता में एकता की अवधारणा को ही अपनाते हुए विभिन्न धार्मिक सामजिक समुदायों के बीच मौजूद अंतर्विरोध को आपसी सहमती के साथ घटाने का प्रयास किया जाये तो बेहतर हो सकता है  भारतीय समाज |  लेकिन विदेशी राष्ट्रों के साथ परनिर्भरता पूर्ण जुड़ाव को तथा देश में हर तरह की विदेशी घुसपैठ को बढावा देते हुए अनेकता के साथ एकता को तथा देश के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को मजबूत नही किया जा सकता | क्योकि आर्थिक सम्बन्धो एवं प्रक्रियाओं के साथ आपसी विखंडन की कूटनीति एवं विदेशी भोगवादी संस्कृति का आना निश्चित है | वैसे आधुनिक काल में यह विदेशी सांस्कृतिक हमला ब्रिटिश राज के दौरान शुरू हो गया था | पर 1947 से पहले साम्राजय्वाद विरोधी राष्ट्रवाद की प्रचंड लहरों ने उसे बढने से रोक दिया था | लेकिन अब खासकर 1991 के बाद तेजी से एवं खुलेआम बढाये जाते रहे वैश्वीकरण से , भोगवादी नग्न अर्द्धनग्न संस्कृति को बढावा देते रहे विकसित पश्चिमी देशो के साथ बढ़ते आर्थिक , कुटनीतिक सांस्कृतिक सम्बन्धो से राष्ट्र की संस्कृति पर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर भारी खतरा खड़ा हो गया है | इस खतरे को इस्लाम व दुसरे धर्मावलम्बियों के मध्य युगीन धार्मिक , सांस्कृतिक कारवाइयो के विरोध के जरिये नही रोका जा सकता है | उसके लिए आधुनिक युग के  साम्राज्यवादी विरोधी राष्ट्रवाद का पुनर्जागरण किया जाना आवश्यक है | साम्राजयवादी देशो से बढ़ते आर्थिक सांस्कृतिक सम्बन्धो पर रोक लगाना आवश्यक है | साथ ही धार्मिक सामाजिक विख्न्दन की अंतर्राष्ट्रीय एवं सत्ता स्वार्थी कूटनीत के विरोध में देश की अनेकता के साथ एकता की सांस्कृतिक भावना को पुन: जागृत करना जरूरी है |

सुनील दत्ता स्वतंत्र पत्रकार समीक्षक

Sunday, October 29, 2017

आजादी या मौत 30-10-17

गदर पार्टी --- पृष्ठभूमि
आजादी या मौत

तीस जून सत्रह सौ सत्तावन – हिन्दुस्तान के इतिहास में एक काला दिन भागीरथी नदी के तट पर बसा एक गाँव | पलाश – आम्र – कुंजो से घिरा | कोलकाता से डेढ़ सौ किलोमीटर उत्तर में बंगाल राज्य की राजधानी मुर्शिदाबाद से पच्चीस किलोमीटर दूर | पलाश पुष्पों से सुगन्धित पलाशी या प्लासी | इस गाँव में जुटती है दो सेनाये – बंगाल के अंतिम स्वतंत्र नवाब सिराजुद्द्दौला की सेना , अपने पचास हजार सैनिको और फ्रांसीसी तोपों के साथ | दूसरी और ईस्ट इंडिया कम्पनी की सेना राबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में इक्कीस सौ भारतीय और साधे नौ सौ ब्रिटिश सैनिको और एक सौ पचास तोपों के साथ || इस एक दिन के युद्द में जिसमे वर्षा के कारण फ्रांसीसी टोपे भीगकर नाकाम हो गयी थी , विजय क्लाइव और उसकी सेना की होती है – केवल सात यूरोपियन और सोलह भारतीयों की मृत्यु तथा तरेह यूरोपियन और छत्तीस भारतीयों के आहत होने के बाद | वास्तव में यह विजय ईस्ट इंडिया कम्पनी की उतनी नही थी जितनी भारतीयों की पराजय थी --- अपनी नीतियों के कारण सिराजुद्द्दौला को उसकी सेना के पदोंवनत सेनापति मीरजाफर ने एन वक्त पर धोखा दिया | यह सोलह हजार सैनिको का नेतृत्त्व कर रहा था | अंग्रेजो के लालच दिए जाने के कारण वह युद्द से बाहर रहा | आफी और सैनिक भी लालच दिए जाने के कारण वह लोग भी युद्द सी बाहर रहे | साथ ही अन्य लोग यार लतीफ , जगत सेठ अमीरचंद महाराजा कृष्णनाथ रावदुर्लभ आदि अंग्रेजो के प्रलोभन से निष्क्रिय हो गये |
भारतीय सैनिको में राष्ट्रीयता जैसी कोई भावना तो थी नही | जो भी उन्हें खरीद सकता था , खरीद लेता वास्तविकता तो यह है कि इस युद्द में ईस्ट इंडिया कम्पनी का एक पैसा भी खर्च न हुआ | साढ़े नौ सौ यूरोपियन सैनिको को छोड़कर सारा खून दोनों और से भारतीयों का बहा | इस प्रकार पारम्परिक इर्ष्या शत्रुता विद्देश और नितांत स्वार्थपरता के कारण भारतीयों ने अपने गले में गुलामी की जंजीरे डालने में अंग्रेजो का साथ दिया |
फिर उस साम्राज्य का विस्तार देने तथा उसके सुद्रढ़ रहने में भी भारतीय सैनिको ने अपना खून बहाया | एक दिन के इस युद्द ने भारत को दुर्भाग्य के द्वार पर खड़ा किया और पश्चिम को भाग्योदय के पथ पर |
इस युद्द ने ईस्ट इंडिया कम्पनी को भारत का एक समृद्द प्रदेश दे दिया , शासन करने को | बंगाल उस समय भारत का सबसे धनी प्रदेश था | क्षेत्रफल में भी बड़ा | तीन करोड़ की आबादी का प्रदेश , उन्नत उद्योग – धंधे फलता – फूलता व्यापार , राज्यकोष को भरपूर मुद्रा देने वाला | बंगाल पर आधिपत्य होने के बाद अंग्रेजो ने जितनी भी नीतिया अपनाई – कृषि , उद्योग व्यापार सम्बन्धी , वे सब अपना घर भरने के लिए बेशर्मी से की गयी लूट की , इंग्लैण्ड के लिए धन बटोरने की जन – विरोधी थी | स्वंय क्लाइव ने बंगाल के खजाने को जी भर कर लुटा | कम्पनी के कर्मचारियों और अधिकारियों में नैतिकता नाम की कोई चीज न थी | नीच से नीच काम करने में उन्हें कोई हिचक नही थी | वचन देकर तोड़ना उनके लिए गिरगिट के रंग बदलने जैसा था | मीरजाफर को उन्होंने वचन दिया था , नया नवाब बनाने का | बनाया तो मात्र कोई बहाना बनाकर हटाने के लिए | उसके माध्यम से लुट को वैध बनाना ही उनका ध्येय था |
विश्व के और विशेत: भारत के इतिहास में यह पहला अवसर था , जब विजयी शासक की कोई निष्ठा विजित प्रजा के हित – साधन में नही थी | अब तक जितने भी शासक आये थे , वे भारत में भारतीय बनकर रहे | उन्होंने जो भी निर्माण किया इस देश में किया | प्रशासन में अधिकाँश अधिकारी भारतीय रहे | किन्तु ब्रिटिश लोगो में भारत में भारतवासी बनकर रहने की कोई इच्छा न थी , भारत उनके लिए व्यापार की एक मंदी था , अपना कैरियर बनाने का एक सुनहरा अवसर था | यहाँ वे कुछ ही समय में मालामाल होकर वापिस इंग्लैण्ड में जाकर एशो आराम की जिन्दगी बसर करने के लिए आते थे | भारत उनके जीवन का अस्थायी पडाव था | पहली बार भारत वास्तव में एक दुसरे देश का गुलाम बना | जहा उसके भाग्य का निर्णय उसकी धरती पर न होकर सात समन्दर पार ब्रिटेन की संसद में होता था | उन लोगो द्वारा जिनकी निष्ठा अपने देश को स्वंय को उन्नत करने में थी | भारत में की गयी लुट उसका साधन थी |
अंग्रेजो के आगमन से पूर्व भारत के गाँव अपने आप में एक स्वायत्त इकाई थे |
उनकी आर्थिक – सामाजिक – सांस्कृतिक सरचना पर शासको के बदलने का कोई विशेष प्रभाव नही होता था | वे केन्द्रीय शासन – परिवर्तन के प्रति उदासीन थे | उनका मूलमंत्र था , ‘’ को नृप होय हमे का हानि ‘ |
अंग्रेजी शासन ने उनकी वह तंद्रा तोड़ दी |
कम्पनी की अनेक नीतियों में जो दूरगामी परिणामो की जनक थी , शायद सबसे क्रूर नीति थी – व्यापार पर अपना सम्पूर्ण प्रभुत्व जमाना | कम्पनी ने अपने शासित प्रदेश में और शासित प्रदेश से किये जाने वाले व्यापार करने के लिए स्वंय को आयात – निर्यात शुल्क में पूर्णत: मुक्त कर लिया | साथ ही अनेक वस्तुओ के उत्पादकों को धमकी दी कि यदि वे कम्पनी के साथ व्यापार सम्बन्ध रखते है तो और किसी को अपनी उत्पादित वस्तु नही बेचेगे | अनेक बार कम्पनी की आवश्यकताओ से अधिक पैदा हुई वस्तु की फसल को खेतो में ही जला दिया जाता | करी – मूल्य का निर्धारण भी उसी के हाथ में था | बाहर से ( विशेषत: ब्रिटेन से ) आयातित वस्तुओ का विक्रय मूल्य भी वही तय करते | इस प्रकार व्यापार भी एक वृहद् लूट का साधन बन गया उस लुट से समर्थित ब्रिटेन की औद्योगिक क्रान्ति के फलस्वरूप जब इंग्लैण्ड में मिल स्थापित होने लगा , तो बंगाल के वस्त्र उद्योग की भारी हानि हुई | बंगाल के कारीगरों द्वारा बुना गया कपड़ा विषभर में श्रेष्ठ माना जाता था | ब्रिटेन के घर – घर में उसकी खपत थी | मिलो को सहयोग देने का अर्थ था उस उन्नत गृह – उद्योग को योजनाबद्द तरीके से बर्बाद करना | वही हुआ भी | कम्पनी की नीति के कारण कुछ ही वर्षो में प्रदेश श्रेष्ठ वस्त्रो के निर्यात करने वाले प्रांत के स्थान पर कच्चे माल को पैदा करने वाला स्थान बनकर रह गया | कम्पनी का लाभ दुगना हो गया | कच्चा माल वह मनमानी कम कीमत पर खरीदती और ब्रिटेन में बुने मिल के कपड़ो को स्वंय निर्धारित मूल्य पर बेचती | भारतीय उद्योगों को किस प्रकार योज्नाब्द्द्द नष्ट किया गया गया इसका हृदय विदारक विवरण पंडित सुन्दरलाल की पुस्तक ‘ भारत में अंग्रेजी राज ‘ में विस्तार से दिया गया |
अगर व्यापार नीति भारत के लिए इतनी घातक थी , तो कृषि – नीति ने तो परम्परागत ग्रामीण समाज की कमर तोड़ दी | अंग्रेजो के आगमन से पहले राजाओं द्वारा जो कर के रूप में धन उगाहा जाता था , वह उपज का एक निश्चित अंश होता था | अकाल या पैदावार कम होने पर किसान पर आयकर का बोझ नही पड़ता था या कम हो जाता था | किन्तु 1793 में तत्कालीन गवर्नर जनरल कार्नवलिस ने स्थायी रूप से भूमिकर निश्चित कर दिया | खेती में हुई लाभ – हानि का उस कर की राशि से कोई सम्बन्ध न था | फसल की हानि से अंग्रेजो को कुछ लेना – देना न था | अगर कोई किसान कृषि कर देने में सक्षम नही होता , तो उसकी जमीन नीलाम कर दी जाती | प्राय: वह जमीन नगर में रहने वाले अमीर लोग खरीद लेते | इस प्रकार अनुपस्थित जमीदारो का एक नया वर्ग पैदा हो गया | अपने नियुक्त किये प्रतिनिधियों से वे उनके द्वारा खरीदी गयी जमीनों पर खेती करने वाले काश्तकारों से मन – मना लगान वसूल करवाते | कभी – कभी भूमि स्वामियों को लगान देने के लिए महाजनों से ऊँची व्याजो पर ऋण लेना पड़ता | इस प्रक्रिया में सूदखोरों की एक नयी जमात पैदा हो गयी | सूद इतना अधिक हो जाता कि अंत में किसानो को अपनी गिरवी रखी भूमि को छुडाना असम्भव हो जाता | इस प्रकार बहुत से किसान भूमिहीन श्रमिक हो गये – भयंकर शोषण के शिकार हो गये |
जो जमीन इस व्यवस्था में यूरोपियन गोरो के कब्जे में आ गयी उसको उन्होंने खाद्यान के स्थान पर जूट , नील कपास या चाय – काफी के विशाल बागो में बदल दिया | इससे उन्हें विपुल आर्थिक लाभ होने लगा | कमाया धन इंग्लैण्ड भेजा जाने लगा | आवश्यक खाध्यान्न की कमी होती गयी | खाद्यान्न की कमी होने का एक और कारन यह था कि फसल काटने पर गोर व्यापारी सस्ते दामो में उसे खरीदकर वर्मा आदि अन्य देशो में भेज देते और फिर जरूरत होने पर मंगाकर ऊँचे दामो में बेच देते | किसान को लगान देने के लिए बेचनी पड़ती | गोरो को खरीदने – बेचने में दुगना लाभ होता | इन नीतियों का दुष्परिणाम था लगभग हर दस वर्ष में एक बार अकाल पढ़ना | ब्रिटिश साम्राज्य का 1757 से आरम्भ हुआ विस्तार 1849 में अपनी पराकाष्ठा पर पहुचा , जब पंजाब पर गोरो का आधिपत्य हो गया |
उन्नीसवी शताब्दी के उतराद्ध में जबसे भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की पूर्ण स्थापना हुई भारत में साथ बार भयकर अकाल पडा | 1853 – 54 , 1865 – 66 1876 – 78 , 1888 – 89 , 1891 ,92, 1896 – 97 और 1899 – 1900 में | सबसे भयकर अकाल 1876 – 78 में पडा | बैस महीनों की अकाल की अवधि में साढ़े तीन लाख लोगो की मृत्यु हुई | मद्रास प्रेसिडेंसी में ही उसके जनपदों में साढे तीन लाख लोगो की मृत्यु हुई | अकालो की यह श्रृखला भारत के 1947 में स्वतंत्र होने के पांच वर्ष पूर्व तक रही , जब 1942 -43 में बंगाल के दुर्भिक्ष में 90 लाख लोगो की मौत हुई जबकि जमाखोरों के गोदामों में अनाज भरा पडा सड़ रहा था |
अगर एक और इन सब नीतियों के कारण भारत निरंतर दरिद्र हो रहा था | तो दूसरी और साम्राज्य विस्तार के लिए और उसको सुदृढ़ करने को सेना का विस्तार तेजी से किया जा रहा था | जिस सेना के बूते पर क्लाइव ने प्लासी का युद्द जीता था , उसमे 2100 भारतीय और 950 ब्रिटिश सैनिक थे | पर 1790 के दशक में आते – आते कार्नवलिस के समय में सेना में 13 .500 ब्रिटिश सैनिको को मिलाकर सत्तर हजार सिपाही हो गये थे | रुसी सेना के बाद उस समय यह विश्व की सबसे बड़ी सेना थी | 1826 में इसी सेना में सिपाहियों की संख्या दो लाख इक्यासी हजार हो गयी थी जिनमे दस हजार पांच सौ इकतालीस ब्रिटिश थे | 1857 में सैनिक विद्रोह के समय इसी सेना में तीन लाख ग्यारह हजार तीन सौ चौहत्तर सैनिक थे , जिनमे मात्र पैतालीस हजार पांच सौ बैस ब्रिटिश थे | 1914 में प्रथम महायुद्द के समय ब्रिटिश भारतीय सेना में तेरह लाख भारतीय सिपाही थे | उनमे से एक लाख चालीस हजार पश्चिमी मोर्चे में युद्दरत थे और सात लाख मध्यपूर्व में लड़ रहे थे | प्रथम महायुद्द में सैतालिस हजार सात सौ छियालीस भारतीयों ने अपनी जाने गंवाई और पैसठ हजार एक सौ छबीस भारतीय घायल हुए |
इसी प्रकार द्दितीय विश्वयुद्द में 25 लाख 80 हजार भारतीय सिपाहियों को झोक दिया गया जिसमे 87 हजार ने अपने प्राण गवाए और इससे अधिक घायल हुए और सबका भार वहन करती रही दींन – दुखी भारतीय जनमानस | और साम्राज्य की रक्षा में अपनी जान देने वाले इन भारतीयों में कोई अफसर नही होता था | उनका वेतन भी अंग्रेज सिपाहियों के अनुपात में बहुत कम होता था | इसी प्रकार भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ , जब असैन्य प्रशासन में भी कोई भारतीय ऊँचे पद पर नियुक्त नही हुई | किसी भी नीति को निर्धारित करने में भारतीयों की भागीदारी नही रही |
अकाल ही नही , प्लेग / महामारी . मलेरिया आदि रोगों भी भारत में प्रचुर मात्रा में होने लगे | 1907 में में प्लेग से ही हर सप्ताह साथ हजार लोग मर रहे थे | महामारी / प्लेग में उस वर्ष 20 लाख लोग मारे गये | 1901 – 11 के दशक में स्थिति इतनी खराब थी की पंजाब की आबादी बढने की जगह 2.2 प्रतिशत घाट गयी थी | एक अंग्रेजी लोक कथन में भारत की उस समय की अवस्था का वर्णन इस प्रकार किया गया था –
Land of shit and filth and wogs
Gonorrea , syphilis , clap and pex
Memsahibs’ paradise, sodiers’ hell
India , for thee , fuking well
इस प्रकार भारतीय दुर्भाग्य , जो 1757 में प्लासी के युद्द से आरम्भ होकर 1849 में पंजाब के गोरो के शासन का भाग बनने पर स्थायित्व पा गया था , शेष ब्रिटिश शासन काल में गुलामी , गरीबी और शोषण का प्रतीक बन गया था | बेकारी युवको के जीवन का पर्याय बन गयी थी | यह अकारण नही था कि पंजाबी युवक सेना की सेवा की और आकर्षित हुए | 1857 के सैनिक विद्रोह को जो भातीय स्वतंत्रता के लिए किया गया प्रथम देशव्यापी युद्द था , ब्रिटिश साम्राज्य ने कुचला था तो उसमे सिख सैनिको का विशेष योगदान था | तभी से अपनी कूटनीति से इनको को मार्शल रेस कहकर अन्य वर्गो से उन्हें पृथक और विशिष्ठ बनाने की झूठी कोशिश की थी | ‘’ फुट डालो और राज करो ‘’ की कूटनीति का अंग था यह बढावा देना | इसी नीति का परिणाम था कि एक समय ब्रिटिश साम्राज्य की सेवा में रत लाखो सैनिको में चालीस पैतालीस प्रतिशत पंजाबी / सिख थे | वे न केवल अंग्रेजी साम्राज्य के भारत में सुदृढ़ स्तम्भ थे वर्ण दक्षिण पूर्व एशिया के देशो में भी ब्रिटिश हितो की रक्षा में सहायक थे | देश से बाहर जाकर सिपाही के रूप में काम करना पंजाब की घुटन से निकलने जैसा था | अशिक्षित या अल्पशिक्षित युवको को वह बेहतर जीवन जीने का अवसर लगता था | उन्नीसवी शताब्दी के अंतिम दशक में 1897 में महारानी विक्टोरिया के शासन की हीरक जयंती मनाई गयी थी |उसमे भाग लेने के लिए कुछ पंजाबी / सिख सैनिको को भी चुना गया था | समारोह में भाग लेने के बाद उन सिपाहियों को ब्रिटिश साम्राज्य के अन्य देश कनाडा की भी सैर कराई गयी थी | कनाडा का क्षेत्रफल भारत के क्षेत्रफल से बहुत बड़ा था और जनसंख्या अत्यंत कम | पंजाब के इन सैनिको को वहा की धरती , जहा खेती के लिए विशाल खेत उपलब्ध थे आकर्षक लगी | वहा साधारण श्रमिक का दैनिक वेतन भी भारत में मिलने वाले वेतन से कई गुना था | चूँकि कनाडा भी उस समय ब्रिटिश उपनिवेश था और भारतीय सैनिक भी ब्रिटिश साम्राज्य की सेना के अंग थे , उन सैनिको पर्यटकों को लगा की कनाडा में बसने का उन्हें पूरा अधिकार है | उसमे से कुछ्ह सैनिको ने सेवा – निवृत्ति के बाद कनाडा में जाकर अपने भाग्य आजमाने का निर्णय लिया | इन सैनको के अतिरिक्त यही समय था जब भारत से विवेकानन्द रामतीर्थ ने विश्व धर्म संसद में 1896 में व्याख्यान देकर तहलका मचा दिया था | इन धर्म गुरुओ ने अमेरिका की समृद्दी का जो गुणगान किया , उससे भी भारतीय युवक बहुत प्रभावित हुए | इन घटनाओं के परिणाम स्वरूप उन्नीसवी शताब्दी में अंतिम वर्षो में भारत से पंजाबी युवको का कनाडा – अमरीका गमन शुरू हुआ |


 प्रस्तुती -- सुनील दत्ता  --- स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक



आभार ----------- लेखक --- वेद प्रकाश ' वटुक '

Saturday, October 28, 2017

अतीत को खगालता - लीडराबाद

अपना शहर मगरुवा

अतीत को खगालता - लीडराबाद
माले मुफ्त दिले बेरहम - बड़े गजब के लोग बैठते थे लीडराबाद में
लीडराबाद के शिरोमणि --
स्व तहसीलदार पाण्डेय स्व कृष्ण पाल सिंह स्व कपिलदेव सिंह स्व राकेश उपाध्याय और अब है कैलाश पाण्डेय ..........
आजमगढ़ का वैभव बड़ा ही अच्छा रहा है और यह धरती ऋषि मुनियों की ताप स्थली के साथ ही सामाजिक और राजनितिक इतिहास से भी प्रबल है | इसी कड़ी में आज आपको ले चलते है कलेक्ट्री कचहरी के पास सिविल लाइन पुलिस चौकी के पीछे श्रीराम काफी हाउस ( लीडराबाद ) इसको स्थापित करवाया कुम्भन दास जी ने कुम्भन दास जी गिरधर दास अग्रवाल के बेटे थे और मऊ के रहने वाले थे | उन्ही के द्वारा यह जगह 1953 में श्रीराम हलवाई को होटल खोलने के लिए दिया गया | श्रीराम हलुवाई ने अपने मेहनत और ईमानदारी से लोगो के दिल में जगह बनाई | जब मैं काफी हाउस आज का लीडराबाद पहुचा तो देखा रोज की तरह मगरुवा बैठा है मैंने उससे हालचाल पूछा उसने जबाब दिया सब ठीक है तब मैंने बड़े प्यार से कहा कि भाई मगरू जी कुछ इसके बारे में बताये मगरू अतीत की यादो में खो गया ------- और उसकी वाणी से निकल पडा काफी हाउस से बना लीडराबाद का संस्मरण -- सन 53 के बाद से ही यह काफी हॉउस प्रदेश और देश की राजनीत का चर्चा का केंद्र बन गया | इस जगह पर आजमगढ़ के बड़े दिग्गज राजनेता अपना अखाड़ा जमाते सुबह 9 बजे के बाद से ही यहाँ पर अपना अखाड़ा जमाते थे और यह बहस शाम ढलने तक चलती थी | जिले में जितने बड़े नेता हुए यह अपनी जवानी के दिनों में यही से राजनीत करते थे इस जगह पर वामपंथी धारा के कामरेड जय बहादुर सिंह , कामरेड तेज बहादुर सिंह , कामरेड झारखडे राय कामरेड चन्द्रजीत यादव जो बाद में कांग्रेसी हो गये , बाबू त्रिवेणी राय व् तमाम कम्युनिस्ट नेता बैठते थे ,वही पर युवा तुर्क के अजीज साथी आदरणीय रामधन जी ,कांग्रेसी नेता पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्व कल्पनाथ राय , पूर्व सांसद स्व राजकुमार राय , शिक्षक विधायक स्व पंचानन राय , पूर्व मंत्री शम्भु सिंह , स्व छागुर राम , पूर्व मंत्री स्व रामप्यारे सिंह , स्व बाबू बृज भूषण लाल श्रीवास्तव , स्व त्रिपुरारी पूजन प्रताप सिंह उर्फ़ बच्चा बाबू पूर्व ब्लाक प्रमुख गोरख़ सिंह , बाबू राम कुवर सिंह संन 1948 से ही ठीकेदारी करने वाले स्व लालता सिंह , मझगावा के स्व रज्जू सिंह हीरापट्टी के बाबू स्व अक्षयबर सिंह और कोयलसा के स्व बाबु भृगुराज सिंह सहकारिता आन्दोलन के सजग प्रहरी बाबु रामकुवर सिंह जैसे जिले के मानिद लोगो की यहाँ पर राजनीत की महफिल सजती थी | अलग - अलग टेबल पर अलग धाराओं की जबर्दस्त चर्चा होती थी कभी - कभी यह चर्चा इतना उग्र रूप धारण करती थी लगता था कि अब नही तब झगड़ा हो जाएगा | यह भी कहा जा सकता है श्रीराम काफी हाउस राजनितिक अडी के लिए जाना जाता था और आज भी है | इन नेताओं की पसंदीदा डिश '' कलेजी - कबाब - मखन्न ब्रेड और ख़ास नीबू की काली चाय तब का जमाना सस्ती का था उस समय वह पर 40 पैसे में गरम् छोला , आठ आने में गुलाब जामुन पेडा , शाही टुकडा , मीठी बुनिया 40 पैसे में दहीबड़ा इसके साथ ही उस समय पाँच रूपये प्लेट कलेजी -- मटन और पचास पैसे में कबाब मिला करता था इन सबके शौक़ीन यहाँ बैठने वाले सारे लोग थे | मगरू ने कहा एक बार तहसीलदार पाण्डेय अपने साथियों के साथ यहाँ बैठे थे एक अखबार लेकर परम मित्र सुनील राय जी वहाँ पहुच कर पाण्डेय जी को कैलाश पाण्डेय समझकर उनसे कहा क्या पाण्डेय जी मेरे खिलाफ आपने समाचार दिया है तब तहसीलदार पाण्डेय ने कहा ऐसी कोई बात नही तभी सुनील राय जी उनको अखबार दिखाने लगे पूरा समाचार पढने के बाद उन्होंने कहा राय साहब मैं कैलाश पाण्डेय नही हूँ यह समाचार तो कैलाश पाण्डेय ने दिया है | तभीवहाँ पर बैठे एक नेता ने कहा कि यह क्या नेतागिरी करेंगे जब आदमी पहचान नही सकते ?
यहाँ पर बैठने वाले दो नेता शशी राय और यादवेन्द्र ऐसे नेता है जिन्होंने सारा जीवन खाने की राजनीत की एक संस्मरण इनका -- संसद का सेन्ट्रल हाल लंच के समय खचाखच भरा हुआ था और यह दो फक्कड और घुमक्कड़ अवैध रूप से घुसकर वहाँ सूप पी रहे थे , थोड़ी देर बाद पूर्व सांसद डा संतोष सिंह भी वहाँ लंच करने के इरादे से गये थे | वहाँ पर एक भी कुर्सी खाली नही थी , उन्होंने चारो तरफ नजर दौड़ाई तो देखा आजमगढ़ के दो फटीचर नेता शशी प्रकाश राय और यादवेन्द्र सिंह बैठकर सूप पी रहे है उन्होंने वेटर से पूछा यहाँ अनाधिकृत लोग कैसे बैठे हुए है , तो वेटर ने जबाब दिया सभी माननीय सांसद सदस्य जी है , तब डा सन्तोष सिंह जी ने शशी प्रकाश राय और यादवेन्द्र सिंह की तरफ इशारा करके कहा कि यह आजमगढ़ के दो फटीचर सांसद है क्या ? यह दोनों डर के मारे सूप छोडकर भगे कि कही प्राथमिकी दर्ज न हो जाए और संसद के बाहर आकर चिल्ला चिल्ला कर कहने लगे सांसद होने का मतलब यह नही की कार्यकर्ताओं को सूप भी न पीने दे | इन दोनों महानुभावो ने पूरा जीवन किसी व्यक्ति की समीक्षा में इस बात पर तौला की उसने इन दोनों को कितना खिलाया | जिले के एक ऐसे काग्रेसी नेता बीरभद्र प्रताप सिंह जी भी अनोखे थे इनकी एक घटना बकौल यादवेन्द्र सिंह वो अक्सर चर्चा करते थे भारतवर्ष के किसी पूर्व सांसद के रूप में संसद की सुविधाओं का माले - मुफ्त - दिले बेरहम को जैसा चरितार्थ किया उसकी आजाद भारत में दूसरा कोई मिशाल नही है | समूचे संसद सत्र के दौरान वह सोमवार से शुक्रवार तक यूपी भवन में मुफ्त में रुकते और संसद भवन के कैंटीन में मुफ्त का भोजन करते | दार्शनिको की तरह यादवेन्द्र सिंह बोलते है कि शुक्रवार को कैंटीन से चावल ब्रेड मखन्न , अंडे इत्यादि जो की संसद की कैंटीन में न्यूनतम दामो में प्राप्त होता था , उसको ले आकर सूटकेस में भरते थे और वो भरी सूटकेस को ढोने के लिए मुझे या शशी प्रकाश राय को दिल्ली ले जाते थे , एक बार सूटकेस ज्यादा भारी होने पर मैंने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उनके सूटकेस को पटक दिया और सूटकेस खुल गया मैंने देखा की इसमें चावल ब्रेड अंडे इत्यादि बिखरे है | इन्होने रेलवे पुलिस को गुहार लगाई मुझे पकड़ने के लिए और मैं पतली गली से सरक लिया | वैसे बीरभद्र जी के बहस का मुख्य विषय छिनारपंन होता था , और खूटी पर टंगी साडी दिख जाए तो वे उधर दौड़ लगा देते थे | इसी चर्चा में एक और अनोखी चर्चा एक बार भाजपा नेता श्याम नरायन सिंह के साथ बाबू शिवनाथ सिंह लखनऊ की रेल यात्रा कर रहे थे |, शिवनाथ भाई को यह मालूम नही था कि नेता श्याम नरायन सिंह कभी टिकट लेकर नही चलते उस यात्रा में बाराबंकी - बादशाह नगर के बीच में रेलवे के विजिलेंस जाँच के दौरान श्याम नरायन सिंह बाथरूम में घुस गये विजलेंस के अधिकारी ने उनको बाथरूम से निकला व उनसे टिकट माँगा टिकट ना होने पर उसने इन्हें दो तमाचा मारा और सौ बार कान पकडकर उठक -- बैठक करवाया हर्जाना भरने के बाद यह बीजेपी कार्यालय गये और वहाँ पर बोकरादी पेल रहे थे कि मैं तो शिवनाथ सिंह के चक्कर में फंस गया उन्हें नही मालुम था कि शिवनाथ सिंह उनके पीछे खड़े है उन्होंने श्याम नरायण सिंह के कंधे पर थपकी मरकर कहा की श्याम नरायण तुमने टिकट ही कब लिया था तुम तो बिना टिकट यात्रा करने में माहिर हो | श्रीराम काफी हॉउस के तीन शिरोमणि थे , बैठोली के कपिलदेव सिंह , तहसीलदार पाण्डेय और कांग्रेसी नेता कपिलदेव सिंह बकौल कांग्रेसी मगरू ने चर्चा करते हुए कहा कि शिक्षक नेता मुन्नू यादव जी बहुत बार चर्चा करते है हीरापट्टी के नाते सुरेन्द्र सिंह के साथ वो तालकटोरा के राष्ट्रीय अधिवेशन में में पुराने अधिवेशन का पास लेकर घुस गये सुरक्षा गर्दो ने कोई ध्यान नही दिया अन्दर घुस कर उन्होंने गर्दो से कहा की मैं पूर्व मंत्री हूँ और वही अन्दर से ही उन्होंने नाते सुरेन्द्र सिंह को बुलाया और कहा ये भी मेरे साथ है | अधिवेशन के बाद बकौल मुन्नू यादव् ने बोला उस अधिवेशन में सोनिया जी रात्र का भोजन अपने यहाँ दस जनपथ में आयोजित किया था उक्पिल्देव सिंह ने मुन्नू यादव से बोला चलो मेरे साथ तुम सोनिया जी के यहाँ रत्रिभोजन में मुन्नू ने कहा की वहाँ अन्दर कैसे जायेंगे उन्होंने कहा चलो अंदर चले जायेंगे वहाना पहुचकर वो कुछ देर इन्तजार किये तभी वह पर केन्द्रीय मंत्री राजेश पायलेट आ गये वो तुरंत आगे बढ़े उन्होंने पायलेट जी से बोला आपने कृषि नीति पर जबर्दस्त बोला है इसकी चर्चा पुरे देश में हो रही है और उनका हाथ पकडकर अन्दर चले गये अंदर पहुच कर मुन्नू से बोले मुन्नू देशी घी से बोला रोटी मत खाना बस देशी घी से तला देशी मुर्गा और तली मछली खाना ऐसे वीर थे कपिलदेव सिंह में एक बात और थी वो जब भी किसी की पैरवी करते तो वो हमेशा अपनी गाडी में दस लीटर पेट्रोल भरवाते उससे जिसकी पैरवी करने जाना होता था और उसी से पाँचगिलास मोसम्मी का जूस भी पीते -- इस लीडराबाद के शिरोमणियो में कृष्ण पाल सिंह और राकेश उपाध्याय यह दोनों ही अदभुत प्राणियों में से एक थे राकेश उपाध्याय की बात करते हुए मगरू ने कहा एक बार शिबली कालेज के अध्यक्ष बीरेंद्र सिंह बुलडाग के यहाँ एक समारोह में राकेश नेता गये रात्रि विश्राम के बाद सुबह तडके ही मनौती के लिए एक बकरा बंधा था उनके दरवाजे पर राकेश ने उसकी रस्सी खोल ली और फुर्र हो गये | करतारपुर से लेकर पहाडपुर तक आ गये अचानक बुलडाग की नीद खुली उन्होंने देखा खूटी से बकरा गायब है वो तुरंत समझ गये की यह काम राकेश उपाध्याय का है वो तुरंत अपनी मोटर साइकिल से उनको खोजते हुए पहाडपुर तक आये उन्होंने देखा की राकेश उपाध्याय के हाथो में बकरे की रस्सी है उन्होंने उस रस्सी को प्राप्त करने के लिए राकेश को सौ रूपये दिए तब उन्हें बकरे की रस्सी मिली | १९८५ में डा सांसद संतोष सिंह जब उनका जलवा था उनके आवास पर राकेश उपाध्याय गये उसी समय डा सन्तोष सिंह अपनी रिवाल्वर निकल क्र बिस्तर पर रखकर बाथरूम गये उसी दरमियाँ राकेश उपाध्याय उनका रिवाल्वर लेकर वहा से फुर्र हो गये जब डा सन्तोष सिंह बाथरूम से वापस ए उन्होंने देखा उनका रिवाल्वर गायब है उनके होश उड़ गये वो तुरंत अपनी गाडी से राकेश उपाध्याय को खोजते हुए रैदोपुर औए अपने प्र्चितो से उन्होंने पूछा की राकेश नेता को देखा है तब वही पर खड़े सामजवादी विचारक संजय श्रीवास्तव ने कहा चले जाइए पुराने पुल के पास आपको राकेश नेता गाँजा पीते हुए मिल जायेगे डा संतोष सिंह हाफ्ते पुराने पुल स्थित मंदिर पर पहुचे तो वह पर राकेश उपाध्याय मौजूद थे उन्होंने बिना किसी डर भय के डा सन्तोष सिंह से अपनी चिर परचित तोतली आवाज में कहा का हो जान गईला रिवाल्वर गायब हो गईल तो डा सन्तोष सिंह ने क़तर भाव से कहा मुझे डर था कि वह रिवाल्वर तुम पैसा लेकर किसी को बेच ना दो और वह अपराधी कृतकर मुझे फँसा न दे | तब राकेश ने कहा पहिले पाँच सौ रुपया डा तब तोहर रिवाल्वर मिली उनके पांच सौ रुपया देने के पश्चात उन्होंने खुरपी उठाई और जमीन खोदने लगे लगभग एक फीट जमीन खोदने के बाद रिवाल्वर दिखाई दिया तब उन्होंने डा सन्तोष सिंह ने रहत की सांस लिया ऐसे विलक्ष्ण थे राकेश उपाध्याय एक खास बात वरिष्ठ पत्रकार सिर्फ लीडराबाद राकेश उपाध्याय और रोहित यादव को पैसा देने के लिए यहाँ आते थे | एक बार विधान सभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय नेता हुकुमदेव नारायण यादव लीडराबाद में भाषण करने आये उनके भाषण में संस्कृत का पुट था जिससे वरिष्ठ पत्रकार बनवारी लाल जालान जी अत्यधिक प्रभावित हुए और उन्होंने राकेश उपाध्याय के दुसरे जोड़ीदार वरिष्ठ नेता कृष्ण पाल सिंह ( के पी सिंह ) से श्री यादव के भाषण की तारीफ की तो बेलौस ढंग से के पी सिंह ने जबाब दिया की जब अहीर संस्कृति बोले लगे औरत पिंगला बांचे लगे तब समझ लिहा घोर कलयुग अ गएल हवे इस पर वहां उपस्थित लीडर\बाद ठहाको से गूंज उठा |
वक्त बदला पर श्रीराम काफी हाउस ( लीडराबाद ) का क्रेज जस का तस बना रहा | बदलते जमाने की रफ़्तार के साथ ही इसका नया नामकरण हुआ | वरिष्ठ पत्रकार बनवारी जालान ने एक नाम दिया लीडराबादउसके बाद यहाँ पर राजनीति की अडी जमाने खाटी समाजवादी चिन्तक व नेता बड़े भाई विनोद कुमार श्रीवास्तव प्रखर समाजवादी व वरिष्ठ पत्रकार बड़े भाई विजय नरायन , असलाई के किसान नेता स्व श्याम बहादुर सिंह कामरेड अतुल अनजान , पूर्व सांसद डा संतोष सिंह , चुन्न राय पूर्व विधायक समई राम पूर्व मंत्री फागु चौहान , पूर्व मंत्री सुखदेव राजभर , विधायक आलमबदी, पूर्व कांग्रेसी नेता बाबु लालसा राय , कामरेड अरुण सिंह एडवोकेट , पूर्व मंत्री बलराम यादव , कांग्रेसी नेता हवलदार सिंह , काग्रेसी नेता ज्ञान राम , काग्रेसी नेता सूरज राय , काग्रेसी नेता कृष्ण कान्त, पाण्डेय हीरापट्टी के बाबु सुरेन्द्र सिंह , कवलधारी राम , जुलेफेकार बेग , इम्तेयाज बेग ज्ञान प्रकाश दुबे समाजवादी नेता तहसीलदार पाण्डेय , कैलाश पाण्डेय जैसे लोगो का जमावड़ा होता रहा | इस जगह पहले जो राजनितिक बहसे हुआ करती थी एक साफ़ सुधरा माहौल में पक्ष - विपक्ष की राजनीत करने वाले एक दुसरे का सम्मान और ख्याल रखते थे , पहले आम आदमी के कष्टों पर यही से आन्दोलन खड़े होते थे वो परम्परा अब यहाँ से समाप्त हो गयी अब नई परम्पराओं ने जन्म ले लिया है पहले जो राजनीति बहस हुआ करती थी इन लोगो के समय में अब उसमे बदलाव आ गया उसकी कड़ी में मंत्री दारा चौहान , डा बलिराम , , बलिहारी बाबु डा राम दुलारे , हीरालाल गौतम , पूर्व विधायक विद्या चौधरी , आफताब आलम कुरैशी , तेज बहादुर यादव हवलदार सिंह पूर्व अध्यक्ष जिला पंचायत हवलदार यादव यहाँ के आकर्षण से यहाँ का व्यापार करने वाला तबका भी सन्तु अग्रवाल गोकुल दस अग्रवाल मिठ्ठू अग्रवाल राजेन्द्र अग्रवाल उर्फ़ राजे बाबू यहाँ तक की दिलीप अग्रवाल इस जगह पर आके लुफ्त उठाते रहते है | यह काफी हाउस यहाँ के अधिवक्ताओं का भी आकर्षण केंद्र बना रहा कभी यहाँ पर वरिष्ठ अधिवक्ता स्व कमलाकर सिंह , स्व जगदीश सिंह लालता सिंह वरिष्ठ अधिवक्ता और कांग्रसी नेता स्व कपिलदेव सिंह अधिवक्ता अनिल गौड़ , अधिवक्ता शिवकरन, अधिवक्ता शत्रुघन सिंह , अधिवक्ता इन्द्रासन सिंह अधिवक्ता और पत्रकार महेंद्र सिंह जैसे लोगो की यहाँ पर बैठकी लगती थी | अब तो समय की रफ़्तार ने यह की हर चीज को बदल दिया है |

Saturday, February 18, 2017

शहीद नगरी बेवर से --- हम लड़ेंगे जिन्दगी के वास्ते अंधेरो से 19 - 2-2017

शहीद नगरी बेवर से --- हम लड़ेंगे जिन्दगी के वास्ते अंधेरो से



कभी मुठ्ठियों की हरकत से
घर – घर नया उजाला होगा
फिर बारी आई है
बुझी मशाल जलाने की
हम लड़ेंगे
जिन्दगी के वास्ते
अंधेरो से
रौशनी के वास्ते
इसी रौशनी के वास्ते शहीद नगरी बेवर में विगत पैतालीस वर्षो से शहीद मेला का आयोजन उन महान क्रांतिवीर शहीदों को हमेशा दिल में संजोये रखने के लिए प्रति वर्ष नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जन्म दिन 23 जनवरी से शुरू होता है हम आपको बताते चले कि यह क्रान्ति मेला की शुरुआत 1972 में कामरेड जगदीश नरायण त्रिपाठी ने एक दिवसीय मेले के रूप में इसका सूत्रपात किया था | आज यह मेला उनके भतीजे राज त्रिपाठी के नेतृत्त्व में 20 दिन का मेला हो गया है |
23 जनवरी 2017 को इस शहीद मेला का उद्घाटन करने क्रांतिवीर सुखदेव के भतीजे अशोक थापर – संदीप थापर इसके साथ ही शहीदे ए वतन अशफाक उल्ला खा के पौत्र अशफाक उल्ला ने इस मेले का मशाल जलाकर विधिवत उदघाटन किया |
क्रांतिवीर चचा अशफाक उल्ला खा के पौत्र ने जनमानस को सम्बोधित करते हुए कहा कि शहीदों की मूर्ति लगाने से कुछ नही होगा , बल्कि उनको हमे रिश्तो से जोड़ने की जरूरत है , जब हम उन्हें रिश्तो से जोड़ेगे तब वो हमारे दिल के बहुत करीब होंगे ऐसे में हमेशा उनकी याद बनी रहेगी और वो प्रेरणा देते रहेगे ,|
चचा क्रांतिवीर सुखदेव के भतीजे अशोक थापर ने अपने सम्बोधन में कहा कि देश को आजादी के उजाले में लाने वाले शहीदों की सहादत की तुलना करना ठीक नही | ग्रामीण स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक आजादी के संघर्ष में अपनी आहुति देने वाले वीर एक समान है उनका सम्मान एक जैसा होना चाहिए | सुखदेव के दुसरे भतीजे संदीप थापर ने कहा कियह दुनिया शहीदों को जातीय खांचे में ना बाटे क्रांतिवीरो की कोई जाती नही होती है बस उनका एक धर्म था देश को अंग्रेजो से मुक्ति दिलाकर आम हिनुस्तान के आम आदमी को आजादी दिलाना इसी आजादी के लिए वो सारे हमारे पुरखे हँसते – हँसते फांसी के फंदों को चूम लिया उन्होंने अपना वर्तमान हमारे भविष्य के लिए कुर्बान कर दिया इस शहीद मेले से सरकार को एक अपील की गयी कि क्रांतिवीर सुखदेव की प्रतिमा संसद भवन में लगे | शिवचरण लाल शर्मा के पुत्र सरल कुमार शर्मा के पुत्र ने कहा कि देश की जंग ए आज़ादी के नायकों को सरकार ने कभी सम्मान नहीं दिया जिसके वो हकदार थे। उन्होंने आगे कहा कि पुरे भारत में शहीदों के कुर्बानियों पे कही भी इस तरह के मेले का आयोजन नही होता है | मेला को सुचारू रूप से गति प्रदान करने वाले शहीद जमुना प्रसाद त्रिपाठी के पौत्र और मेला प्रबन्धक राज त्रिपाठी ने कहा कि हमारे पूर्वज कामरेड जगदीश नरायन त्रिपाठी ने इस मेले की परम्परा की नीव डाली है अब यह पौधा बनकर खिल रहा है इसे वट वृक्ष का स्वरूप हम नौजवान देंगे उन्होंने आगे बताया कि मेले का उद्देश्य सिर्फ मेला लगाना नही है हमारा उद्देश्य है कि 1857 से निकली चिंगारी जो 19 शातब्दी में आग बन चुकी थी उसमे हमारे पुरखो ने देश की आजादी के अपनी आहुति दी है उन पुरखो को आगे के समय में आने वाली पीढ़ी से अवगत करना है कि किस जज्बे और हौसले से हमे आजादी मिली है जिसके कारण हम इस आजाद मुल्क में अपनी बात को कह सकते है और आजादी में सांस लेते है |
शहीद मेला करीब 19 दिन चलता है इस मेले की ख़ास बात यह है कि शहीद मंच से विभिन्न भिन्न कार्यक्रमों की प्रस्तुती दी जाती है 24 - 25- को समाज में जागरूकता लाने के लिए सांस्कृतिक माध्यमो से सनेश दिया गया 26 जनवरी गणतंत्र दिवस पर बेवर नगर के सदर चौराहे से साझी विरासत के तहत झंडा रोहन के बाद हजारो की संख्या में जलूस में परिवर्तित होकर लोग शहीद क्रान्ति मंदिर और समाधि स्थल पर माल्यापर्ण कर यह जलूस शहीद मेला स्थल पर राजा तेज सिंह के किला में लगे क्रांतिवीरो शहीदों की प्रदर्शनी स्थल पर समाप्त हुआ | दिनाक 27 को सिविल पेंशनर जिला सम्मेलन के माध्यम से जानकारी दी गयी 28 जनवरी को नारी शक्ति महिला सम्मेलन व शुशी प्रदर्शनी के माध्यम से यह बताने की कोशिश की गयी आज की नारी अबला नही है आज नारी सबल हो गयी है | तारिक 29 को धर्मदृष्टि परिवार की ओर से ‘’ कलम उनकी जय बोल ‘’ के माध्यम से समाज में फैले भ्रांतियों के साथ अंध विश्वास पर जबर्दस्त प्रहार किया गया | 30 जनवरी को बेवर नगर के सुभाष चौक से शहीदों की याद में शहीद राज कलश यात्रा के माध्यम से उन सार शहीदों को श्रद्दांजली अर्पित किया गया | 31 जनवरी विधिक साक्षरता सम्मेलन के माध्यम से अवाम को विधिक जानकारी दी गयी |
1 फरवरी को साक्षरता सम्मेलन के माध्यम से शिक्षा के महत्व पर प्रकाश डाला गया |
2 फरवरी स्वतंत्रता सेनानी सम्मेलन के माध्यम से स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी व्यथा को व्यक्ति किया | अमर शहीद चन्द्र शेखर आज़ाद के भतीजे सुजीत आज़ाद व् पौत्र अमित आज़ाद ने कहा कि आज के इस दौर में शहीदों के व्यक्तित्व और कृतित्व से नई पीढ़ी को परिचित कराता और उनकी स्मृतियों को संजोता ये शहीद मेला पूरे देश के लिए एक मिसाल है। शहीद मेला का मुख्य आकर्षण रहा राष्ट्रीय कवि सम्मेलन को आगे बढाते हुए संदेश चौहान ने पढ़ा , हमने विरोध जुल्म का किया , जाति का नही इतिहासों से पूछो यदि हो संदेह कही आलोक भदौरिया ने पढ़ा , कई घर बार जलते है , कई लाशें भी गिरती है इसी कीमत पे मिलता है नये सरदार का चेहरा | मेले के समापन के अवसर पर कार्यक्रम के मुख्य अतिथि काकोरी काण्ड के क्रांतिवीर रामकृष्ण खत्री के पुत्र उदय खत्री ने कहा कि आजादी के जंग में जिन पुरोधाओं के बल पर आज हम लोग आजादी की सांस ले रहे है मैं उन अनाम व नाम क्रांतिवीरो को इस मंच से नमन करता हूँ , उन्होंने शलभ श्रीराम की पंक्तियों से हिन्दोस्तां की शान है अशफाक व बिस्मिल ,दो जिस्म है इकजान है अशफाक व बिस्मिल , इस देश के दो लाडलो के नाम से ज़िंदा ,दो सूरते – ईमान है अशफाक व बिस्मिल समापन समारोह की अध्यक्षता कार्न्तिवीर पंडित गेंदा लाल दीक्षित के प्रपौत्र मधुसुदन दीक्षित ने कहा कि मैं यह बात दावे से कह सकता हूँ ऐसा शहीद मेला पुरे भारत के किसी अंचल में नही लगता है धनी है बेवर की धरती जहा 15 अगस्त 1942 में ही विद्यार्थी कृष्ण कुमार ने थाने पर तिरंगा लहरा दिया जिसका नेतृत्त्व जमुना प्रसाद त्रिपाठी व सीताराम गुप्त ने अपने प्राणों की आहुति दे दी ऐसी है यह बेवर की धरती हम इसको शत – शत नमन करते है | समापन समारोह में मेला श सयोजक इन्द्रपाल सिंह यादव , हाजी इदरीश अली , भगवान दास मिश्रा श्याम स्नेही श्याम त्रिपाठी रमेश गुप्ता गगन भारत , बिपिन चतुर्वेदी , डा रामधन राठौर उमेश राठौर , अजय सिंह भास्कर ने अपने विचार व्यक्त किये जी एस एम् विद्यालय के बच्चो द्वारा समर्पित अनेकता में एकता के माध्यम से शहीद मेला के समापन को यादगार बना दिया |
समापन के अंत में शहीद मेला के प्रबन्धक राज त्रिपाठी ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि ‘’ नही सदा इतिहास सिर्फ शमशीर लिखा करती है , नही वक्त के साथ सदा तकदीर चला करती है |