Monday, January 18, 2016

. भला हुआ मेरी मटकी फूटी 19-1-16

गुलाल और बुल्लेशाह ..............
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. भला हुआ मेरी मटकी फूटी
एक घटनाअदभुतपूर्व है , जो मनुष्य जाति के पूरे इतिहास में कभी नही घटी ----- गुलाल और गुलाल के गुरु के बीच घटी --- न पहले कोई वैसा उल्लेख है , न बाद में वैसा कोई उल्लेख है |
फिर दुबारा कभी घटेगी , इसकी भी आशा भी नही | और बड़ी अलौकिक है |
गुलाल शिष्य थे बुल्लाशाह के | यह तो कोई बात ख़ास नही : बुल्लाशाह के बहुत शिष्य थे | और हजारो सदगुरु हुए है और उनके लाखो शिष्य हुए , इसमें कुछ अभूतपूर्व नही | अभूतपूर्व ऐसा है कि गुलाल एक छोटे - मोटे जमीदार थे और उनका एक चरवाहा था -- बुलाकीराम | लेकिन बुलाकीराम बड़ा मस्त आदमी था , उसकी चाल ही कुछ और थी ! उसकी आँखों में खुमार था | उसके उठने - बैठने में एक मस्ती थी | कही रखता था पैर , कही पड़ते थे | और सदा मगन रहता था | कुछ था नही उसके पास मगन होने को --- चरवाहा था , बस दो जून रोटी मिल जाती थी , उतना ही काफी था |
सुबह से निकल जाता खेत में काम करने को , जो भी काम हो , रात थका - मादा लौटता ; लेकिन कभी किसी ने उसे अपने आनन्द को खोते नही देखा |
एक आनन्द की आभा उसे घेरे रहती थी | उसके बाबत खबरे आती थी -- गुलाल के पास , मालिक के पास -- कि चरवाहा कुछ ज्यादा काम करता नही , क्योकि हमने इसे खेत में नाचते देखा , काम यह क्या ख़ाक करेगा ! तुम भेजते हो गाये चराने , गाय एक तरफ चरती रहती है , यह झाड पर बैठ कर बासुरी बजाता है | हाँ , बासुरी गजब की बजाता है , यह सच है , मगर बासुरी बजाने से गाय चराने से क्या लेना - देना है ? तुम तो भेजते हो कि खेत पर यह काम करे और हमने इसे खेत में काम करते तो कभी नही देखा , झाड के नीचे आँख बंद करके बैठे जरुर देखा है |
यह भी सच है कि जब यह झाड के नीचे आँख बंद करके बैठता है तो इसके पास से गुजर जाने में भी सुख की लहर छू जाति है ; मगर उससे खेत पर काम करने से क्या सम्बन्ध है !
बहुत शिकायते आने लगी | और गुलाल मालिक थे | मालिक का दंभ और अंहकार | तो कभी उन्होंने बुलाकीराम को गौर से तो देखा नही | फुर्सत भी न थी ; और भी नौकर होंगे , और भी चाकर होंगे | और नौकर - चाकरों को कोई गौर से देखता है ! नौकर - चाकरों कोई कोई आदमी भी मानता है ! तुम अपने कमरे में बैठे हो , अख़बार पढ़ रहे हो नौकर आकर गुजर जाता है , तुम ध्यान भी देते हो ? नौकरों से तुमने कभी नमस्कार भी की है ? नौकर की गिनती तुम आदमी से थोड़े ही करते हो |
नौकर से तुमने कहा है आओ बैठो , कि दो क्षण बात करे ? यह तो तुम्हारे अंहकार के बिलकुल विपरीत होगा |
खबरे आती थी , मगर गुलाल ने कभी ध्यान दिया नही था | उस दिन खबर आई की शुबह ही सुबह कि तुमने भेजा है नौकर को कि खेत में बुआई शुरू करे , समय बीत जाता है बुआई का मगर बैल हल को लिए खड़े थे और बुलाकीराम झाड के नीचे आँख बंद किये दोल रहा है |
एक सीमा होती है ! मालिक सुनते - सुनते थक गया था | कहा : मैं आज जाता हूँ और देखता हूँ | जाकर देखा तो बात सच थी | बैल हल को लिए खड़े थे एक किनारे -- कोई हाकने वाला ही नही था -- और बुलाकीराम वृक्ष के नीचे आँख बंद किये दोल रहा था | मालिक को क्रोध आ गया | देखा - यह हरामखोर , काहिल , आलसी .... ! लोग ठीक कहते है | उसके पीछे पहुचे और जाकर जोर से एक लात उसे मार दी | बुलाकीराम लात खाकर गिर गा पडा आँखे खोली | प्रेम और आनन्द के अश्रु बह रहे थे | बोला अपने मालिक से " मेरे मालिक ! किन शब्दों से धन्यवाद दूँ ? कैसे आभार करूँ ? क्योकि जब आपने लात मारी तब मैं ध्यान कर रहा था | जरा सी बाधा रह गयी थी मेरे ध्यान में | आपकी लात ने वह बाधा मिटा दी , जिससे मैं नही छुट पा रहा था | जब भी ध्यान में मैं मस्त हो जाता हूँ तो यही बाधा मुझे घेर लेती है , यही मेरी आखरी अड़चन थी | जगब कर दिया मालिक आपने भी ! मेरी बाधा यह है कि मैं मस्त हो जाता हूँ ध्यान में , तो गरीब आदमी हूँ , साधू - संतो को भोजन करवाने के लिए निमंत्रण करना चाहता हूँ , लेकिन यह है ही नही भोजन जो करवाऊ , तो बस ध्यान में मस्त होता हूँ तो मानसी - भंडारा करता हूँ | मन ही मन मैं सारे साधू - संतो को बुला लेते हूँ कि आ जाओ , सब अ जाओ , दूर - दूर देश से आ जाओ ! और पक्तियों पर पक्तिय साधुओ की बैठी थी और क्या - क्या भोजन बनाये थे मालिक ! परोस रहा था और मस्त हो रहा था ! इतने साधू - संत आये थे ! एक से एक महिमा वाले ! और तभी अपने मार दी लात | बस दही परोसने को रह गया था ; आपकी लात लगी , हाथ से हांडी फर गयी , दही बिखर गया | मगर जगब कर दिया मालिक , मैंने कभी सोचा भी न था कि आपको ऐसी कला आती है ! हांडी क्या फूटी , मानसी भंडारा विलुप्त हो गया , साधू संत नदारत हो गये -- कल्पना ही थी सब , कल्पना का ही जाल था - और अचानक मैं उस जाल से जग गया , बस साक्षी मात्र रह गया |
आँख से आँसू बह रहे है आनन्द के और प्रेम के , शरीर रोमांचित है , हर्षोन्माद से ----- एक प्रकाश जहर रहा है | बुलाकीराम की यह दशा पहली बार गुलाल ने देखि | बुलाकीराम ही नही जगा साक्षी में , अपनी आंधी में गुलाल को भी ले उड़ा ले गया | आँख से जैसे एक पर्दा उठा गया |पहली दफा देखा कि यह कोई चरवाहा नही ; मैं कहा - कहा , किन - किन दरवाजो पर सदगुरुओ को खोजता फिरा और सदगुरु मेरे घर में मौजूद था ! मेरी गायो को चरा रहा था , मेरे खेतो को सम्भाल रहा था ! गिर पड़े पैरो में | बुलाकीराम , बुलाकीराम न रहे --- बुल्लाशाह हो गये | पहली दफा गुलाल ने उन्हें सम्बोधित किया : बुल्ला साहिब ! ' मेरे मालिक , मेरे प्रभु ! ' साहब का अर्थ : प्रभु | कहा थे नौकर कहा हो गये शाह ! शाहों के साह !
कहते है फकीर बहुत फकीर हुए है , लेकिन बुल्लाशाह का कोई मुकाबला नही | और यह घटना बड़ी अनूठी है | अनूठी इसलिए है कि युगपत घटी | सदगुरु और शिष्य का जन्म एक साथ हुआ | सदगुरु का जन्म भी उसी वक्त हुआ उसी सुबह ; क्योकि वह जो आखरी अड़चन थी , वह मिटी | इसलिए भी अद्भुँत है कि वह आखरी अड़चन शिष्य के द्वारा मिटी | हालाकि गुलाल ने कुछ जानकर नही मिटाई थी , आकस्मिक था , मगर निमित्त तो बने ! शिष्य ने सदगुरु की आखरी अड़चन मिटाई | इधर गुरु का जन्म हुआ , इधर गुरु का अबिभार्व हुआ , उधर शिष्य के जीवन में क्रान्ति हो गयी | बुल्लाशाह को कंधे पर लेकर लौटे गुलाल; | वह जो लात मारी थी न , जेवण भर पाश्चात्ताप किया , जेवण भर पैर दबाते रहे |
बुल्लाशाह कहते : मेरे पैर दुखते नही क्यों दबाते हो ? वे कहते : वह जो लत मारी थी .....! तीस  - चालीस साल बुल्लाशाह ज़िंदा रहे , गुलाल पैर दबाते रहे | एक क्षण को साथ नही छोड़ा | आखरी क्षण में भी बुल्लाशाह में भी बुल्लाशाह के मरते वक्त गुलाल पैर दबा रहे थे | बुल्लाशाह ने कहा : अब तो बंद कर दे रे पागल ! पर गुलाल ने कहा कि कैसे बंद करूँ ? वह जो लात मारी थी !
गुरु को लात मारी ! बुल्लाशाह लाख समझाते कि तेरी लात से ही तो मैं जगा , मैं अनुगृहित हूँ , तू नाहक पश्चात्ताप मत कर | लेकिन गुलाल कह्तेव : वह आपकी तरफ होगी बात | मेरी तरफ तो पश्चात्ताप जारी रहेगा |
लेकिन एक साथ ऐसी घटना पहले कभी नही घटी थी कि सदगुरु हुआ और शिष्य जन्मा - एक साथ , युगपत ! एक क्षण में यह घटना घटी | यह आग दोनों तरफ एक साथ लगी और दोनों को जोड़ गयी |
----------------------------------------------------------- ओशो -- कबीर

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