Tuesday, May 1, 2018

'' हँसने की चाह ने मुझको इतना रुलाया है '' -मन्ना डे 1-5-18

'' हँसने की चाह ने मुझको इतना रुलाया है '' -मन्ना डे




' जिन्दगी कैसी है पहेली , कभी तो हंसाये कभी ये रुलाये '
कभी देखो मन नही चाहे पीछे -- पीछे सपनों के भागे
एक दिन सपनो का राही
चला जाए सपनों के आगे कहा


जीवन के इस फलसफे की अभिव्यक्ति देने वाले मन्ना डे का आज जन्मदिन है |
कलकत्ता महानगर के उत्तरी इलाके का हिस्सा जो एक ओर चितरजन एव्नु और दूसरी ओर स्वामी विवेकानन्द स्ट्रीट से घिरा है | हेदुआ के नाम से जाना जाता है जहा आज भी नूतन के साथ पुरातन के दर्शन होते है | हेदुआ के इस सडक का नाम शिमला स्ट्रीट है -- शिमला स्ट्रीट की एक गली मदन बोसलेन की गलियों की पेचीदा सी गलिया चंद दरवाजो पर पैबंद भरे टाटो के पर्दे और धुंधलाई हुई शाम के बेनाम अँधेरे सी गली से इस बेनूर से शास्त्रीय संगीत के चिरागों की शुरुआत होती है एक भारतीय दर्शन का पन्ना खुलता है और प्रबोध चंद डे ( मन्ना डे ) का पता मिलता है |
1 मई 1920 को श्री पूर्ण चन्द्र डे व महामाया डे के तीसरे पुत्र प्रबोध चन्द्र डे के रूप में जन्म लिया | बाल्यकाल में प्रबोध को लोग प्यार से मन्ना कह के बुलाते थे |
मन्ना दा के घर का माहौल सम्पूर्ण रूप से संगीतमय था | उनके चाचा श्री के सी डे स्वंय बड़े संगीतकार थे इसके साथ ही उस घर में बड़े उस्तादों का आम दरफत था जिसका गहरा असर मन्ना के बाल मन पर पडा उसका असर बहुत ही गहरा था | हेदुआ स्ट्रीट के एक किनारे खुबसूरत झील थी लार्ड कार्व्लिस नाम से और दूसरी ओर स्काटेज क्रिश्चियन स्कूल उसी में इसकी शिक्षा दीक्षा हुई | मन्ना दा अपने कालेज के दिनों में अपने दोस्तों के बीच गाते थे | इसी दरमियाँ इंटर कालेज संगीत प्रतियोगिता हुई उसमे मन्ना दा ने तीन वर्ष तक सर्वश्रेष्ठ गायकी का खिताब अपने नाम कर लिया |
यही संगीत प्रतियोगिता मन्ना डे के जीवन का पहला टर्निग प्वाइंट है | इसके बाद ही बहुमुखी प्रतिभा के धनी अपने चाचा संगीतकार श्री के सी डे के चरणों मैं बैठकर अपनी संगीत साधना की शुरुआत की और अपने संगीत को दिशा देने लगे |
मन्ना डे के बड़े भाई प्रणव चन्द्र डे तब तक संगीतकार के रूप में स्थापित हो चुके थे | दुसरे बड़े भाई प्रकाश चन्द्र डे डाक्टर बन चुके थे और मन्ना के पिता अपने तीसरे बेटे को वकील बनाना चाहते थे | पर नियति के विधान ने तो तय कर दिया था कि प्रबोध चन्द्र डे को मन्ना डे बनना है |

ताल और लय , तान और पलटे , मुरकी और गमक का ज्ञान उनके प्रथम गुरु के सी डे से मिला | इसके साथ ही विकसित हुआ गीत के शब्दों के अर्थ और भाव को मुखरित करने की क्षमता इसके साथ ही मिला अपने चाचा जी की आवाज का ओज और तेजस्विता , स्वर में विविधता सुरों का विस्तार उन पर टिकने की क्षमता ये सम्पूर्णता मन्ना दा ने अपने साधना से प्राप्त किया | नोट्स लिखने का ज्ञान मन्ना ने अपने बड़े भाई प्रणय दा से प्राप्त किया | इसके साथ ही अपने चाचा के सी डे के साथ संगीत सहायक के रूप में कार्य करते हुए युवक मन्ना के जीवन में एक नई करवट ली 1942 में मन्ना दा बम्बई आ गये और यहाँ के सी दास और एस डी बर्मन को भी असिस्ट करने लगे | अब वो स्वतंत्र रूप से संगीत निर्देशक बनना चाहते थे उन्होंने बहुत सारी फिल्मो में अपना संगीत भी दिया | परिस्थितियों की प्रतिकूलता अक्सर आदमी के इरादों को तोड़ता है युवक मन्ना भी ऐसी मन: स्थिति से गुजर रहे थे |
'' हँसने की चाह ने मुझको इतना रुलाया है ''
हताशा और मायूसी से जूझते हुए मन्ना ने यह सोचा होगा कि वो समय भी आयेगा जब सम्पूर्ण दुनिया में मेरे गाये गीत लोग गुनगुनाएगे |
उन्होंने अपना कार्य करते हुए शास्त्रीय संगीत के उस्ताद अब्दुल रहमान व उस्ताद अमानत अली खान साहब से शात्रीय संगीत सिखने का कर्म जारी रखा |
1953 में मन्ना दा की जीवन में दो टर्निग प्वाइंट आता है वही से ये संगीत का सुर साधक अपनी संगीत की यात्रा पर बे रोक टोक आगे की ओर अग्रसर होता है |
प्रथम प्वाइंट इनका सुलोचना कुमारन से विवाह करना और दूसरा वो संगीत का इतिहास बनाने वाला तवारीख जब वो राजकपूर जी के लिए अपनी आवाज देते है वही से मन्ना दा की एक नई संगीत यात्रा की शुरुआत होती है |
राजकपूर की फिल्म '' बुट्पालिश '' के गीत से जहा मन्ना दा से दुनिया की तरक्की के लिए नई सुबह का आव्हान करते है
'' रात गयी फिर दिन आता है
इसी तरह आते -- जाते ही
ये सारा जीवन जाता है
ये रात गयी वो नई सुबह आई ''
से मानव जीवन में आशावाद की एक नई किरण को जन्म देता है वही पर प्यार का इकरार भी करना जानता है
'' आ जा सनम मधुर चांदनी में हम तुम से मिले वीराने में भी आ जायेगी बहार ''
'' प्यार हुआ इकरार हुआ फिर प्यार से क्यु डरता है दिल ''
गाकर नौजवानों को प्यार की परिभाषा पढाते हुए आगे निकल आते है |
शंकर जयकिशन ने ख्याति लब्ध पंडित भीमसेन जोशी के साथ इनकी संगत भी कराई |

जो प्रसिद्धि मन्ना दा को बंगला फिल्म जगत से मिला वो हिन्दी फिल्म जगत से कम था या अधिक यह कहना बहुत कठिन है | एक सवाल खड़ा होता है कि मन्ना ने बंगला फिल्म जगत को छोड़कर मुम्बई का रुख क्यों किया |
मुंबई आने के बाद ही मन्ना का हर स्वरूप का एक्सपोजर हुआ मन्ना का अगला दौर एक अनोखा दौर था जहा पर मन्ना ने भारतीय भाषाओ में गीत गाये उर्दू में गजल , उडिया , तेलगु , मलयालम , कन्नड़ , भोजपुरी और बंगला भाषाओ में इस विविधता के कारण मन्ना दा को एक न्य फ्रेम मिला | एक और सवाल की पाश्वर गायकी के साथ ही मन्ना दा ने गैर फ़िल्मी गीतों को गाया है | जिसके अंदाज बड़े निराले है
'' सुनसान जमुना का किनारा
प्यार का अंतिम सहारा
चाँदनी का कफन ओढ़े सो रहा किस्मत का मारा
किस्से पुछू मैं भला
अब देखा कही मुमताज को
मेरी भी एक मुमताज थी |
दूसरी तरफ अपने गैर फिल्मो से नारी संवेदनाओं का एक ऐसा दर्शन दिया
'' सजनी -------- नथुनी से टूटा मोती रे
धुप की अगिया अंग में लागे
कैसे छुपाये लाज अभागी
मनवा कहे जाए
भोर कभी ना होती रे

मन्ना डे ऐसे फनकार थे जो कामेडियन महमूद के लिए भी गाते थे और हीरो अशोक कुमार के लिए भी चाहे वो शास्त्रीय संगीत हो या किशोर कुमार के साथ '' फिल्म पड़ोसन '' की जुगल बंदी चाहे वो एस डी बर्मन , रोशन या शंकर जयकिशन सभी ने उनके हुनर को सलाम किया |
मन्ना साहब ने जिन किरदारों के लिए गीत गाये वो किरदार इतिहास के पन्नो पर दस्तावेज बन गये |
फिल्म '' उपकार '' में प्राण ने उसमे मलंग बाबा की सकारत्मक भूमिका की और मलंग बाबा एक गीत गाता है


'' कसमे वादे प्यार वफा सब बाते है बातो का क्या
कोई किसी का नही ये झूठे नाते है नातो का क्या
इस गीत ने प्राण का पूरा किरदार ही बदल दिया और मलंग बाबा हिन्दी सिनेमा के इतिहास में दर्ज हो गया |
1971 मन्ना डे को पद्म श्री से सम्मानित किया गया 2005 में पदम् भूषण से नवाजा गया और इस सुर साधक को 2007 में दादा साहेब फाल्के एवार्ड से समानित किया गया | आज ये सुर साधक चिर निद्रा में विलीन हो गया यह कहते हुए

गानेर खाताये शेशेर पाताये एई शेष कोथा लिखो
एक दिन -- आमी झिलाम तार पोरे कोनो खोज नेई |
इस सुर साधक को शत शत नमन
-सुनील दत्ता
स्वतंत्र पत्रकार व समीक्षक

Saturday, April 28, 2018

दैनिक जागरण जो कर रहा है, वो प्रो-रेपिस्ट पत्रकारिता है --- सुशील मानव

दैनिक जागरण जो कर रहा है, वो प्रो-रेपिस्ट पत्रकारिता है


जम्मू के कठुआ रसाना में आठ वर्षीय बकरवाल समुदाय की बच्ची से हुए गैंगरेप को लेकर जिस तरह की असंवेदनशील झूठी और शर्मनाक रिपोर्टिंग हिंदी अख़बार दैनिक जागरण ने की है वे पत्रकारिता का बेहद ही अश्लील नमूना है। इसे प्रो-रेपिस्ट पत्रकारिता कहना ज्यादा मुनासिब होगा।
बता दें कि दिल्ली की फोरेंसिक लैब एफएसएल ने अपनी रिपोर्ट में बच्ची संग मंदिर में बलात्कार की पुष्टि की है। रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि मंदिर के अंदर जो खून के धब्बे मिले थे वो पीड़िता के ही हैं। मंदिर में और लड़की लाश के पास जो बालों का गुच्छा मिला था जाँच में वो एक आरोपी शुभम संगारा के होने की पुष्टि लैब ने किया है। पीड़िता के कपड़ों पर मिले खून के धब्बे उसके डीएनए प्रोफाइल से मैच करते हैं। साथ ही पीड़िता की वजाइना पर खून मिलने की पुष्टि लैब ने की हैं।
बावजूद इतने सारे वैज्ञानिक सबूतों, प्रमाणों, तथ्यों को झुठलाते हुए दैनिक जागरण ने उस मिथ्या बात को हाइलाइट करके फ्रंट पेज पर छापा जो लगातार भाजपा और संघ के लोग दुष्प्रचारित करते चले आ रहे हैं। दैनिक जागरण ने पहले 20 अप्रैल 2018 को चंड़ीगढ़, पटना, दिल्ली, लखनऊ, जम्मू जैसे मेट्रो शहरों के संस्करणों में फ्रंटपेज की हेडलाइन बनाते हुए मोटे मोटे अक्षरों में बच्ची से नहीं हुआ था दुष्कर्म जैसे जजमेंटल हेडलाइन के साथ खबर छापी। और फिर उसके अगले दिन 21 अप्रैल 2018 को फिर से वही आधारहीन मिथ्या खबर को उसी जजमेंटल हेडलाइन बच्ची से नहीं हुआ था दुष्कर्म के साथ इलाहाबाद, कानपुर वाराणसी समेत जैसे छोटे शहरों और ग्रामीण अंचलों के सभी संस्करणों में उसी बर्बरता और निर्लज्जता के साथ दोहराया। साफ जाहिर है दैनिक जागरण अखबार पत्रकारिता के बुनियादी बातों, उसूलों और मूल्यों को त्यागकर सत्ता के मुखपत्र की तरह कार्य करते हुए बलात्कार के पक्ष में मानस को उन्मादित करके जनदबाव बनाने का कार्य कर रहा है जो न सिर्फ अनैतिक अमानवीय व हिंसक है अपितु आपराधिक भी।
दैनिक जागरण हमेशा से ही मिथ्या रिपोर्टिंग करता आया है। लेकिन इधर फासीवादी शक्तियों के सत्तासीन होने के बाद से तो ये अखबार लगभग निरंकुश भाव से  रिपोर्टिंग के नाम मिथ्याचार,दुष्प्रचार और बलात्कार पर उतर आया है। हिंदी है हम जैसे फासीवादी टैगलाइन के साथ मैंथिली मगही, अंगिका और भोजपुरी जैसी समृद्ध भाषाओं वाले बिहार में बिहार संवादी के बहाने दैनिक जागरण भाषाई वर्चस्वाद स्थापित करने के फासीवादी एजेंडे पर काम कर रहा है। एक भाषा एक विचार फासीवादी राष्ट्रवाद के मूल विचारों में से एक है।

आज से दशकों पहले दैनिक जागरण के मालिक नरेन्द्र मोहन ने अखबार के प्रधान संपादक कथाकार कमलेश्वर और दिल्ली के वरिष्ठ सहयोगियों के साथ नोएडा स्थित कार्यालय में मीटिंग की। उस मीटिंग में नरेन्द्र मोहन ने स्पष्ट कहा था कि जिस तरह उर्दू अखबार मुसलमानों की पत्रकारिता करता है उसी तरह मेरा अखबार हिन्दू पत्रकारिता करेगा। अगर मेरी बातों से किसी को कोई असहमति है तो वे अखबार छोड़कर जा सकते हैं।
बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद हिन्दू पत्रकारिता’ कर रहे दैनिक जागरण को प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया’ ने मुसलमानों के खिलाफ तथ्यात्मक रूप से गलत व भड़काने वाली ख़बरें छापने का दोषी माना था। नरेन्द्र मोहन ने इसके जवाब में कुछ ऐसा कहा कि- प्रेस काउंसिल को जो करना हो करेहमारी भावना प्रकट करने पर कैसे रोक लगा सकता है। इसके बदले में बीजेपी ने नरेन्द्र मोहन को राज्यसभा भेजकर उपकृत किया। बीजेपी का यह कदम अप्रत्याशित नहीं था। बीजेपी को यह पता था कि सांप्रदायिक विचारधारा के चलते भविष्य में दैनिक जागरण उनके कितना काम आनेवाला है।

इसी बीच बिहार संवादी के नाम से पटना बिहार में दैनिक जागरण ने दो दिवसीय साहित्य के उत्सव का आयोजन किया। साहित्यकार अरुण कमल आलोक धन्वा, अरुण शीतांष कर्मेंदु शिशिर, ध्रुव गुप्त, तारानंद वियोगी, प्रेम कुमार मणि, संजय कुमार कुंदन कवयित्री निवेदिता शकील, सुजाता चौधरी व युवा कवि राकेश रंजन ने दैनिक जागरण की प्रो-रेपिस्ट पत्रकारिता के विरोध में  उसके इस कुकृत्य की कड़े शब्दों में भर्त्सना करते हुए बिहार संवादी” कार्यक्रम का बहिष्कार कर दिया।
वहीं दूसरी ओर दिल्ली में दैनिक जागरण के प्रो-रेपिस्ट पत्रकारिता से नाराज़ होकर प्रतिरोध स्वरूप उसके द्वारा दिल्ली में दैनिक जागरण के मुक्तांगन कार्यक्रम का भी साहित्यकारों ने बहिष्कार कर दिया है। मुक्तांगन का बहिष्कार करने वालों में वरिष्ठ कवयित्री सविता सिंह, विपिन चौधरी, कवयित्री सुजाता, दिल्ली जलेस के सचिव प्रेम तिवारी और मिहिर पांड्या शामिल थे। साहित्यकारों द्वारा दैनिक जागरण मुक्तांगन के बहिष्कार से तिलमिलाई मुक्तांगन की मालकिन ने कार्यक्रम के पोस्टर में उन पाँचों साहित्यकारों के नाम पर काली स्याही लगाकर क्रॉस कर दिया। सिर्फ इतना नहीं कार्यक्रम के पहले सत्र में वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव, राकेश वैद और शरद दत्त जैसे भाड़े के लोगो को बुलाकर मुक्तांगन की मालकिन ने बहिष्कार करनेवाले साहित्यकारों पर हमले बुलवायेइन लोगो ने एक स्वर में कहा कि - "मंच छोड़कर जाने के बाद वे ही लोग बाद में सोशल मीडिया पर अपनी भड़ास निकालते हैं। यह सोच निश्चित तौर पर पलायनवादी है।"  हिंदुत्ववादी पत्रकार राहुल देव ने साहित्य जगत को सहनशीलता का पाठ पढ़ाते हुए सीधे साहित्यकार की वैचारिकता पर ही सवाल खड़ा कर दिया। ये कहकर कि- "जागरूकता फैलाने की जगह विरोध करना अनुचित है। हम सिर्फ कहेंगेलेकिन सुनेंगे नहींयह कोई विचारशील व्यक्ति कैसे कर सकता है।" शरद दत्त ने मुक्तांगन का बहिष्कार करने वालों को गिरोहबंदी की संज्ञा देते हुए अपनी फासिस्ट सोच को ही उजागर किया। जब उसने कहा कि - "साहित्य का मंच छोड़कर भागना बुद्धिमता नहीं है। मंच का बहिष्कार गलत है।" फिर तीनों ने सामूहिक हमला करते कहा कि – संवाद का मंच छोड़कर भागना अपराध है। इस तरह साहित्यकारों के बहाने इन्होंने महात्मा गाँधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन से लेकर संसद में विपक्ष के वाकआउट तक को अपराध घोषित कर डाला! बहिष्कार जैसे लोकतांत्रिक प्रतिरोध को अपराध कहना फासीवादी सोच नहीं तो और क्या है।
लेखक संगठनों में से जन संस्कृति मंच ने साहित्यकारों से जागरण संवादी के बहिष्कार की अपील की। इलाहाबाद जलेस के सचिव संतोष चतुर्वेदी ने जलेस इलाहाबाद अनदह, व पहली बार साहित्यिक पत्रिका की ओर से साहित्यकारों से अपील की कि वो जागरण संवादी का हिस्सा न बनें। दिल्ली जलेस के सचिव व साहित्यकार प्रेम तिवारी ने दैनिक जागरण के बलात्कारी पत्रकारिता की घोर भर्त्सना करते हुए कहा,- मैंने मुक्तांगन के कार्यक्रम में जाना स्थगित कर दिया है। दैनिक जागरण की पत्रकारिता जनतांत्रिक और सेक्युलर मूल्यों और मर्यादाओं की हत्या करने वाली साबित हुई है। वरिष्ठ कवि अरुण कमल ने दैनिक जागरण कठुआ गैंगरेप मामले में दैनिक जागरण की उस खबर को सीधा सीधा फासिज्म को प्रमोट करने वाला बताते हुए दैनिक जागरण की इस अमानीय व बर्बर हरकत की भर्त्सना की और कहा कि अखबार द्वारा बलात्कारियों के पक्ष में इस हद तक की गलतबयानी करना उस बच्ची के साथ बलात्कार करने जैसा ही है। कवि मदन कश्यप ने कहा कि दैनिक जागरण हमेशा से ऐसा ही अखबार रहा है, सांप्रदायिक आधार पर खबरों व तथ्यों को तोड़ मरोड़कर पेश करने वाला। खबरों को तो छोड़िए लेखों को भी हद से ज्यादा इडिटिंग करता है ये, इसीलिये मैंने कभी कुछ नहीं लिखा इस अखबार के लिए। मदन कश्यप जी कहते हैं कि वो शुरू से ही दैनिक जागरण के कार्यक्रमों का बहिष्कार करते रहे हैं। उन्होंने सख्त लहजे में कहा कि मैं दैनिक जागरण और बिहार संवादी कार्यक्रम का बहिष्कार करता हूँ तब तक जब तक कि अखबार अपनी मिथ्या खबर का खंडन करके पाठकों से माफी नहीं माँगता। और साहित्यकारों से भी अपील करता हूँ कि वो जागरण संवादी का बहिष्कार करें।
आलोक धन्वा ने फोन पर बताया कि सुबह से पच्चीसों लड़कियों का फोन आ चुका है। वो सब बार बार गुजारिश कर रहीं हैं कि दादा प्लीज आप बलात्कार को प्रमोट करनेवाले बिहार संवादी का हिस्सा मत बनिए। वो आगे कहते हैं कि, यही नन्हीं लड़कियाँ ही तो मेरा बल हैं उनके अनुनय की अनदेखी करके भले मैं कैसे किसी इसके कार्यक्रम में शामिल हो सकता हूँ।
बतौर वक्ता शामिल किये गए लेखक ध्रुव गुप्त ने बिहार संवादी का बहिष्कार करते हुए कहा- 'जागरणने निष्पक्ष पत्रकारिता के मूल्यों की कीमत पर अपने ख़ास राजनीतिक एजेंडे के तहत देश में बलात्कार के पक्ष जो माहौल बनाने की कोशिश की हैउसकी जितनी भी भर्त्सना की जाय कम होगी। 'जागरणके इस अनैतिकअमानवीय और आपराधिक चरित्र के ख़िलाफ़ मैं आज और कल पटना के तारामंडल में आयोजित बिहारियों के तथाकथित साहित्य उत्सव 'बिहार संवादीका बहिष्कार करता हूं।
युवा कवि राकेश रंजन जी बिहार संवादी का बहिष्कार करते हुए कहते हैं-“ कठुआ में सामूहिक बलात्कार के बाद जिस बच्ची की निर्मम हत्या हुईउसे लेकर दैनिक जागरण की कल की रपट बेहद संवेदनहीनदायित्वहीन तथा अनैतिक है। यह रपट नहींकपट हैजिस परिवार का सब कुछ लुट चुका हैउसकी बेचारगी और तकलीफ के साथ किया जानेवाला मजाक है। दैनिक जागरण की जैसी प्रवृत्ति रही हैउसके आधार पर मुझे लगता है कि ऐसा जान-बूझकर किया गया है। मैं इसका विरोध करते हुए आज से आरंभ हो रहे 'बिहार संवादीनामक आयोजन में नहीं जा रहा।
साहित्यकार तारानंद वियोगी ने भी बिहार संवादी का बहिष्कार करते हुए कहा-एक लेखक के रूप में 'बिहार-संवादीमें शामिल होने की सहमति मैंने दी थी। वे मुझसे सीता पर बात करनेवाले थे। मैं भी उत्साह में था कि बोलूंगा। खासकरराम से परित्यक्त होने के बाद सीता की जो दशा थीउनका जो भयानक जीवनसंघर्ष थाउसपर रचे मिथकों के हवाले से कुछ बात करूंगा। मिथिला में प्रचलित सीता की लोकगाथा 'लवहरि कुसहरिको लेकरकि कैसे उस दुखियारी औरत ने जंगल में रहकरलकड़ी चुनकरकंद-फल बीनकर अपने दो बालकों का प्रतिपाल कियाउन्हें लायक बनाया। ध्यान दीजिएगामिथिला में लोकगाथाएं बहुत हैं पर वे या तो दलितों की हैं या वंचितों की। लेकिनसीता और उसके दो बच्चों की लोकगाथा है।
       लेकिनमैं क्या करूं! दुनिया जानती है कि सीता का एक नाम 'मैथिलीभी है।
       और यह भी कि कठुआ की बेटी आसिफा भी एक छोटी-मोटी सीता ही थी।

वरिष्ठ साहित्यकार कर्मेन्दु शिशिर जी बिना किसी लाग लपेट के कहा कि मेरा प्रसंग यह है कि बिना मुझसे बात किये ही उन लोगों ने नाम दे दिया था। कल शाम को पहली बार उनका फोन आया। वैसे भी मैं ऐसे आयोजनों में एकदम नहीं जाता। ऐसे में मेरे जाने का सवाल ही नहीं था। न जाने का निर्णय तो था ही। वह अखबार भी मैं नहीं लेता। कल फेसबुक पर यह प्रकरण देखा। अब यह कि पहले से न जाने के निर्णय को मैं इस विरोध से जोड़ दूँयह बात लगे हाथ क्रांतिकारी बन जाने जैसा होता। न जाना था न गया लेकिन विरोध प्रसंग में भी चुप रहा। झूठ मुझे पसंद नहीं।
कवयित्री निवेदिता ने बिहार संवादी का बहिष्कार करते हुए कहा- “17 जनवरी 2018 की कठुआ बलात्कार मामले  को लेकर जागरण की ख़बर से गहरे आक्रोश में हूँ।

Friday, April 27, 2018

संघर्ष करता दरभंगा --27-4-18

संघर्ष करता दरभंगा --


प्रकाश भाई ने यह एहसास दिलाया की दरभंगा अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल के आयोजको ने अपने बुलाये गेस्टो का जहां बिलकुल ध्यान नही रखा , उपेक्षित रखा वही पर प्रकाश बंधू ने आखरी दिन यह बता दिया की अभी मैथली का आथित्य ज़िंदा है |



दरभंगा इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के दौरान मेरी नजर एक व्यक्तित्व पर पड़ी बंदे के अस्त व्यस्त कपडे बाल बिखरे कुछ समय के अंतराल पर वो बन्दा आडोटोरियम की सीढियों पर अकेला बैठकर अपनी जेब से सिगरेट का पैकेट निकालता और अपनी साँसों से वो सिगरेट को एक अंदाज देता धीरे धीरे सुलगती सिगरेट व चारो तरफ घुमती उसकी आँखे जैसे कुछ खोज रही हो , उसको देखते हुए मुझे फैज़ की नज्म मेरे जेहन में घुमने लगी |
'' शफ़क़ की राख में जल-बुझ गया सितारा-ए-शाम
शबे-फ़िराक़ के गेसू फ़ज़ा में लहराये

कोई पुकारो कि इक उम्र होने आयी है
फ़लक़ को क़ाफ़िला-ए-रोज़ो-शाम ठहराये

ये ज़िद है यादे-हरीफ़ाने-बादा पैमां की
कि शब को चांद न निकले, न दिन को अब्र आये

सबा ने फिर दरे-ज़िंदां पे आ के दी दस्तक
सहर क़रीब है, दिल से कहो न घबराये
मेरी उत्सुकता बढ़ चली आखरी दिन उससे परिचय हुआ उस समय मेरे साथ राज त्रिपाठी , फिल्म अभिनेता रफी खान व चम्बल पे काम करने वाले साथी शाह आलम , वरिष्ठ साहित्यकार बड़े भाई श्याम स्नेही जी थे | मेरा कैमरा इन लोगो पर चला वही प्रकाश बंधू से मैं रूबरू हुआ और मैं उनको लेकर एक तरफ हुआ , सिनेमा - थियेटर पे बात करने को हाजिर हूँ सिनेमाटोग्राफर और रंग निर्देशक प्रकाश बन्धु से बातचीत के कुछ अंश -

कबीर -- आप रंगमंच से कैसे जुड़े , और आपकी शिक्षा ?

प्रकाश बन्धु -- प्रकाश बन्धु को रंगमंचीय संस्कार विरासत में मिली। माता-पिता दोनों ही भारत सरकार के सुचना एवं प्रसारण मंत्रालय के गीत और नाटक प्रभाग में बतौर कलाकार थे और बड़े भाई दीपक बन्धु राष्ट्रिय
नाट्य विद्यालय अभिनय में स्नातक। नई दिल्ली बचपन में पढ़ाई
के दौरान बड़े भाई के दिशा- निर्देश पर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा आयोजित बाल रंग शिविर में रंग निर्देशक शुरेश शेट्टी के निर्देशन में पहली बार मंच से रिश्ता क़ायम किया। स्नातक के दौरान अलग- अलग नाट्य कार्यशालाओं में भाग लेकर अपने आपको रंग-तकनीकों से समृद्ध किया।

कबीर -- किस तरह का रंगमंच करते है आप ? आपने नाटको में कितने प्रयोग किये है ?

प्रकाश बन्धु -- 2001 में दरभंगा भ्रमण के दौरान शहर में वर्षों से चली आ रंगमंचीय खामोशी को तोड़ते हुए "थिएटर यूनिट, दरभंगा" की स्थापना कर दरभंगा को ही अपनी कर्म भूमि बनाया। इस दौरान प्रकाश के सामने कई चुनौतियाँ भी आई जिनमे पहली समस्या थी रंगमंच के लिए दर्शक वर्ग तैयार करना और दूसरी सबसे बड़ी चुनौती थी शहर में एक भी प्रेक्षागृह का न होना। उन दिनों सिर्फ एक चबूतरा नुमा मुक्ताश मंच हुआ करता था जो पुरे दरभंगा का सांस्कृतिक केंद्र था जिसे उस समय के तात्कालिक कुलपति द्वारा
तोड़वा दिया गया और उसके स्थान पर विश्वविद्यालय द्वारा एक घटिया सा सामुदायिक भवन का निर्माण करवा दिया गया जो नाटकों के मंचन के लीये बिलकुल भी उचित नहीं है। तत्पश्चात प्रकाश बन्धु ने नाटकों के मंचन के लिए अलग अलग उपयुक्त स्थानों का चयन किया। कभी भारत सरकार के गीत एवं नाटक प्रभाग के कार्यालय का बरामदा तो कभी दरभंगा का किला या कोई अन्य पौराणिक ईमारत तो कभी टेंट हाउस द्वारा स्टेज बनवाकर। पर ये अत्याधिक खर्चीला होता। प्रकाश बताते हैं कि पिछले तीन वर्षों में मिथिला विश्वविद्यालय द्वरा एक बार पुनः नाट्य विधा के स्नातकोत्तर की पढ़ाई आरम्भ की गयी। विभाग के पास अपना एक छोटा सा प्रेक्षागृह है जो बहुत बेहतर तो नहीं है पर किसी तरह नाटक तो किया ही जा सकता है। नाट्य विभाग ने रंगकर्मियों के लिए इसे पंद्रह सौ रुपय प्रतिदिन पर देना भी शुरू किया पर इसमें भी कई समस्याएं आती ही रहती हैं। पिछले दिनों "रुस्तम सोहराब" नाटक के मंचन के दौरन तो विभागाध्यक्ष ने तो हद ही कर डाला। इस पर हंसी के सिवा अब कुछ और नहीं आती। हाँ वहां पढने वाले छात्रों को लेकर चिंता अवश्य होती है। बहरहाल, अभी प्रकाश बन्धु स्थानीय समाज सेवी मित्र श्री नारायण जी के साथ मिलकर दरभंगा में रंगमंच के लिये एक उचित प्रेक्षागृह के निर्माण की योजना में लगें हुए है। "साधन की अल्पता से महती इक्षाएं कभी अवरुद्ध नहीं होतीं" को अपना मूलमन्त्र मानने वाले प्रकाश बन्धु ने दरभंगा रंगमंच को आधुनिकता के साँचे ढाल एक नई दिशा देने का काम किया है। पिछले चौदाह-पंद्रह वर्षों में प्रकाश बन्धु ने नाटकों की संख्या बढ़ने से ज़्यादा दरभंगा के रंगमंच को तकनिकी,रूप से समृद्ध बनाने और रंगमंच में दर्शकों की भूमिका पर ज़्यादा ज़ोर दिया है। जिसका असर दरभंगा रंगमंच पर साफ़-साफ़ दीखता है। आज बिहार की राजधानी पटना हो या देश की राजधानी दिल्ली, गैर व्यावसायिक नाट्य संस्थाओं के लीये महंगे और बड़े
नाटक(ताम-झाम वाले) बिना सरकारी अनुदान के संभव नहीं है। वहीँ प्रकाश बन्धु बिना किसी सहायता और अनुदान के वर्ष भर अलग-अलग नाट्य प्रस्तुतियाँ देते रहते हैं। आपको बताते चलें कि दरभंगा जैसे शहर में विपरीत परिस्थितियों में भी प्रकाश एक से डेढ़ लाख के बजट का नाटक करते हैं,वो भी टिकट राशि के दम पर जिसका हालिया उदहारण है "आठवाँ सर्ग" और
"रुस्तम सोहराब"। पिछले पंद्रह वर्षों में प्रकाश बन्धु अपनी संस्था के साथ दरभंगा को दर्जनों देसी-विदेशी नाटकों जैसे- अनहद चेहरें, महामहीम, जो घर जारै अपना, बिच्छू, बर्थडे प्रेजेंट, नींद क्यों रात भर नहीं आती, मरणोपरांत, अभिनव जयदेव विद्ध्यापति, अंधा युग, आठवाँ सर्ग, बादशाहत का ख़ात्मा इत्यादि जैसे पूर्णकालिक प्रस्तुतियों के साथ नाट्य कार्यशाला, तीन दिवसीय नाट्य महोत्सव "रंग पेठिया"दिवसीय ( a heart of art and culture), रंगमंच विषयक संगोष्ठी, का भी आयोजन करते हैं।

कबीर आप लम्बे समय से रंगमंच से जुड़े रहने के बाद दरभंगा से निकल कर मुंबई की हुई आपने वहाँ पर क्या क्या कार्य किये है ?

प्रकाश बंधू -- मुम्बई में बतौर अस्सिस्टेंट कैमरामैन प्रकाश बन्धु ने प्रसिद्द कैमरामैन अमित रॉय (जिन्होंने सरकार,निशब्द,आग जैसी कई महत्वपूर्ण सिनेमा का फिल्मांकन किया है।) के साथ काम किया। तत्पश्चात बतौर इंडीपेंडेंट freelance कैमरामैन काम करना शुरू किया। The Awakening,
Angela's Self Requiem, Miyaan Kal Aana, Akhiri Decision(2nd. Unit), Ata Pata Lapata (2nd. Unit) जैसी फिल्मों के टेलीविज़न धारावाहिक जैसे- अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो, विजय देश की आँखें, बाबा ऐसा वार ढूंढो, प्रतिज्ञा, क्राइम पेट्रोल, धरमवीर, बालिका वधु, पृथ्वीराज चौहान इत्यादि का फिल्मांकन किया। प्रकाश बन्धु रंगमंच के लिए पूरी तरह समर्पित है , फिलहाल अपनी तंगहाली में भी प्रकाश भाई ने यह एहसास दिलाया की दरभंगा अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल के आयोजको ने अपने बुलाये गेस्टो का जहां बिलकुल ध्यान नही रखा , उपेक्षित रखा वही पर प्रकाश बंधू ने आखरी दिन यह बता दिया की अभी मैथली का आथित्य ज़िंदा है |

Thursday, April 26, 2018

बैंको की दोहरी नीति ---26-4-18

बैंको की दोहरी नीति ---

किसानो को आत्महत्या करने पर मजबूर करती है |


कारपोरेटो को दामाद की तरह रखवाली करता है बैंक



किसानो को दिए जाते रहे कृषि ऋण और धनाढ्य कारोबारियों को दिए जाने वाले ''कारपोरेट ऋण '' के सन्दर्भ में कृषि मामलो के ज्ञाता लेखक देविंदर शर्मा के दो लेख 23 जनवरी और 1 मार्च के हिंदी दैनिक 'अमर उजाला ' में प्रकाशित हुए है | 23 जनवरी के लेख में ''किसानो की दयनीयता का उत्सव '' शीर्षक के साथ लिखे लेख में उन्होंने यह रोचक तथ्य उजागर किया है कि ''-- जब भी सरकारे किसानो का ऋण माफ़ करती है या उन्हें कोई सब्सिडी देती है तो उसका जोर - शोर से प्रचार और दिखावा किया जाता है | लाभार्थी किसानो को चेको को बड़े - बड़े कटआउट दिए जाते है | मंत्री , सांसद , विधायक ऋण माफ़ी के आयोजित समारोहों में यह संदेश देने के लिए शिरकत करते है कि उनकी सरकार किसानो की बड़ी हितैषी है |
लेकिन जब जब बड़े उद्योगों की बात आती है , तब भारी कर रियायत देने , बैंको द्वारा उनके बड़े कर्जो -- को बट्टेखाते में डालने और खैरात देने के काम को चुपचाप किया जाता है | विकास को प्रोत्साहन देने के नाम पर उन्हें भारी सब्सिडी गुपचुप तरीके से दे दी जाती है | इसके लिए किसी समारोह का आयोजन नही होता | इन बड़े कारोबारियों को वित्तमंत्री या वाणिज्यमंत्री से बट्टेखाते का प्रमाणपत्र पाने की लाइन नही लगानी पड़ती | इसके साथ यह धारणा भी पनपाई जाती है कि कारपोरेट जगत के बट्टे खाते के कर्ज से भी आर्थिक विकास होता है | जबकि किसानो की ऋण माफ़ी से वित्तीय अनुशासनहीनता बढती है और राष्ट्रीय धन का लेखा - जोखा गडबडाता है |

पंजाब , उत्तर प्रदेश कर्नाटक सरकार द्वारा घोषित ऋण माफ़ी के आयोजित समारोहों की चर्चा करते हुए उन्होंने यह सूचना भी दिया है कि 'विभिन्न राज्यों द्वारा कई वर्षो बाद घोषित फसल ऋण माफ़ी की कुल राशि 75.000 करोड़ रूपये की है | --- जबकि राष्ट्रीयकृत बैंको ने वर्ष 2017 - 18 की पहली तिमाही में ही 55 हजार करोड़ से अधिक राशि के कारपोरेट कर्ज को चुपचाप बट्टेखाते में अर्थात वापस न मिल सकने वाले खाते में डाल दिया --- एक साल पहले 2016 - 17 में बैंको ने 77 हजार करोड़ रूपये के कारपोरेट कर्ज को बट्टे खाते में डाल दिया था - पिछले 10 सालो में कुल 3 लाख 60 हजार के कारपोरेट कर्ज को बट्टेखाते में डाला गया है - लेकिन इसका लाभ उठाने वाली डिफाल्टर कम्पनियों का नाम तक उजागर नही किया गया | वित्त मंत्रालय के साथ - साथ रिजर्व बैंक ने बार - बार सुप्रीमकोर्ट से अपील किया कि इन कम्पनियों के नामो का खुलासा न किया जाए | क्योकी यह पूंजीनिवेश एवं आर्थिक विकास के लिए वांछनीय नही है |
इसी तरह से 1 मार्च के समाचार पत्र में ''कारपोरेट और किसान में फर्क क्यो '' शीर्षक के साथ लिखे लेख में उन्होंने किसानो को न्यायालय द्वारा दण्डित किये जाने और धनाढ्य कारोबारियों को चुपचाप छोड़े रखने पर चर्चा किया है | उन्होंने पंजाब हरियाणा के किसानो को 50 हजार से लेकर 2 लाख तक के कर्ज न चुका पाने के फलस्वरूप जिला न्यायालय द्वारा उनको दण्डित करने तथा बैंको द्वारा अपना कर्ज निर्ममता पूर्वक वसूले जाने का उदाहरण दिया है | बैंकिंग व्यवस्था के दोहरेपन को उजागर करते हुए उन्होंने लिखा है कि 'गरीब व वंचित तबके के लोगो के साथ बैंकिंग व्यवस्था बड़ी बेहरमी से पेश आती है जबकि धनी , दिवालिया लोगो के लिए उसने अलग नियम बना रखे है | - खबरों के मुताबिक़ 30 सितम्बर 2017 तक अपनी मर्जी से दिवालिया होने वालो की कुल संख्या 9 हजार से अधिक थी | उन्होंने बैंको के कुल 1.1 लाख करोड़ का कर्ज लौटाने से इंकार कर दिया |' उन्हें दण्डित किये जाने की कौन कहे उनका नाम तक उजागर नही किया गया | लेखक ने इस लेख में भी इस बात को पुन दोहराया है कि वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक सर्वोच्च न्यायलय से जान बुझकर दिवालिया होने वाले बड़े कारोबारियों का नाम उजागर न करने का आग्रह कर चुके है | क्योकि उससे निवेशको में गलत संदेश जाएगा |
इसके फलस्वरूप भी धनाढ्य डिफाल्टरो को इसका फायदा बिना किसी विरोध के मिलता रहा है और बैंको का बट्टेखाते वाला कर्ज भी बढ़ता रहा है | उन्होंने आगे लिखा है कि बैंकिंग नियामक का भय सिर्फ आम आदमी के लिए हैं | किसानो के बकाये की वसूली के लिए हर तरह के अमानवीय हथकंडे अपनाये जाते है | लेकिन उन्ही बैंको के द्वारा कारपोरेट कर्जदार के प्रति बहुत उदार रवैया अपनाया जाता है | संसद की लेखा जोखा समिति ने अनुमान लगाया था कि मार्च 2017 तक बैंको का 6 लाख 80 हजार करोड़ का कर्ज बकाया है | इसमें 70% कर्ज कारपोरेट जगत का है और सिर्फ 1 % कर्ज किसानो से सम्बन्धित है | बैंको ने पिछले दस सालो के 3.6 लाख करोड़ की बट्टेखाते की रकम को माफ़ कर दिया है | इन तथ्यों को सुनाने के पश्चात लेखक ने अंत में एक अजीब सा बयाँन भी दिया है की मैं नही समझ पा रहा हूँ की बकाये कर्ज वसूली के लिए कारपोरेट प्रमुखों के साथ वैसा ही व्यवहार क्यो नही किया जाता जैसा की किसानो के साथ किया जाता है - लेखक का बयाँन इसलिए अजीब है कि वे इस बात से अनजान नही हो सकते की सरकारों को , उनके मंत्रियों को किसानो की कर्ज माफ़ी का ढिढोरा एवं समारोही प्रदर्शन करने की आवश्यकता इसलिए पडती है कि उन्हें सत्ता स्वार्थी राजनीति के लिए देश की सबसे बड़ी आबादी के रूप में मौजूद किसानो के चुनावी समर्थन व वोट की आवश्यकता है - जबकि अल्पसंख्या में मौजूद धनाढ्य कारोबारियों के लिए उन्हें ऐसा करने की कोई जरूरत नही है - इस राजनीतिक मजबूरी के अलावा लेखक इस बात से भी अनजान नही हो सकते की राष्ट्र के धन व पूंजी तथा उद्योग - व्यापार के धनाढ्य मालिको और बहुसंख्यक किसानो के हितो में हल न किया जा सकने वाला अंतर मौजूद है | किसानो को महँगे लागत में सामान बेचकर तथा कृषि उत्पादों को न्यूनतम मूल्य पर खरीदकर ही उद्योग व्यापार के मालिक अपने लाभों पूंजियो को बढ़ा सकते है | इसी तरह से सरकारी खजाने से कृषि क्षेत्र में किये जाते रहे निवेश को घटाकर ही धनाढ्य खजाने का अधिकाधिक हिस्सा पा सकती है ऐसा किये बगैर उन्हें सरकारी खजाने से अपने निजी लाभ बढाने के लिए हजारो करोड़ो की टैक्स माफ़ी , कर्ज माफ़ी तथा अन्य प्रोत्साहनो को पाने का अवसर नही मिल,सकता | इसलिए देश विदेश के धनाढ्य कारोबारियों के लिए उदारवादी एवं निजिवादी छुटो , अधिकारों को बढावा देने के साथ किसानो एवं जनसाधारण हिस्सों के छुटो अधिकारों को काटने उन्हें सरकारी एवं गैरसरकारी कर्ज के संकटो में धकेलने उन्हें उसकी अदायगी के लिए मजबूर करते रहने और कभी - कभार ऋण माफ़ी की घोषणा के साथ उनका चुनावी समर्थन लेने के सिवा और कोई दूसरा रास्ता नही है | इन परस्पर विरोधी आर्थिक सामाजिक स्थितियों में देश के विद्वान् बुद्धिजीवी के पास केवल तीन ही रास्ते बचे है | एक तो यह है कि वे खुलकर धनाढ्य कारोबारियों के पक्ष में खड़े हो जाए | उन्ही के विकास को देश का विकास बताये उनके लिए कर्ज माफ़ी और प्रोत्साहन पैकेजों को देश के विकास के लिए उचित बताये | उनके द्वारा किये बैंको की भारी रकम को न देने के वावजूद उनके नाम को उजागर करने को निवेश और विकास के लिए हानिकारक बताये | देश के उच्चस्तरीय अर्थशास्त्री प्रचार माधय्मी हिस्सा यही कह भी रहा है और उसी की आवाज प्रचार माध्यमो में सुनाई भी पड़ रही है | इसके अलावा दूसरी श्रेणी के विद्वान् बुद्धिजीवी में वे लोग शामिल है जो किसानो श्रमजीवियो जनसाधारण के व्यापक हितो के लिए धनाढ्य वर्गो कारोबारियों पर उनके लाभों छुटो एवं अधिकारों पर अधिकाधिक नियंत्रण एकं कटौती को आवश्यक मानते है | विडम्बना है कि इनकी संख्या बल और इनकी आवाज फिलहाल बहुत कमजोर है और वह सुनाई भी नही पड़ती है
तीसरी तरह के विद्वान् वे लोग है जो किसानो एवं जनसाधारण के हितो की कुछ सूचनाये तो प्रस्तुत करते है मगर वे किसानो के हितो के लिए धनाढ्य कारोबारियों के निजी स्वार्थो हितो पर अंकुश व नियंत्रण नही चाहते | वे उसे बरकरार रखते हुए और बढाते हुए किसानो के हितो की बात करते है | उनके साथ सरकारों तथा बैंको की नियामक संस्थाओं द्वारा की जाती रही ज्यादती या नाइंसाफी पर प्रचार माध्यमो में सवाल भी उठाते रहते है | किसानो एवं धंधी कारोबारियों के बीच अपनाए जा रहे भेदभाव पूर्ण व्यवहार पर आश्चर्य दुःख क्षोभ व्यक्त करते रहते है | बताने की जरूरत नही उनका वह दुःख निर्थक साबित होता है |


सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक

Tuesday, April 24, 2018

किसानो को हर पार्टी छलती है | 24 - 4-18

किसानो को लामबंद होना जरूरी
किसानो को हर पार्टी छलती है |
इनके सपनों को हर कोई रौदा है |

कोई भी किसान इस तथ्य से इन्कार नही करेगा कि खाद , बीज , बिजली , डीजल तथा कृषि के अन्य आधुनिक ससाधन की बढती महगाई के कारण खेती घाटे का सौदा बनती जा रही है | हालाकि सरकारों एवं प्रचार माध्यमो ने यहाँ तक कि कृषि विशेषज्ञ एवं किसान समर्थक कहे जाने वाले बौद्धिक हिस्सों ने कृषि लागत घटाने की मांग को कभी उठने ही नही दिया | इसे चर्चा से बाहर रखकर बिना कुछ कहे ही यह साबित करने का प्रयास किया है कि कृषि लागत के सामानों का मूल्य दाम घटाना सम्भव नही है | कृषि लागत मूल्य में बढ़ोत्तरी को एक अपरिवर्तनीय प्रक्रिया मानकर उनके द्वारा कृषि उत्पादों के बेहतर मूल्य- भाव की मांग को ही प्रमुखता से पेश किया जाता रहा है | प्रचार माध्यमो में किसानो की आय बढाने उसे डेढ़ गुना या दो गुना करने आदि के प्रचारों के साथ किसानो की उपज के बेहतर समर्थन मूल्य की , कृषि उत्पादों की बेहतर बिक्री के लिए मंडी के विकास विस्तार आदि की मांग व चर्चा प्रमुखता से उठती रही है |

वास्तविकता यह है कि किसानो द्वारा बेहतर मूल्य भाव की मांग मुख्यत: इसलिए उठायी जाती है कि कृषि लागत खर्च में लगातार वृद्धि होती रहती है | अगर यह वृद्धि कम हो जाए और खाद बीज , डीजल , बिजली तथा कृषि के के मूल्य घटा दिए जाए तो कृषि उत्पादों के मूल्य को बढाने के लिए बारम्बार की जाने वाली मांग की जरूरत ही नही रहेगी | बस लागत और किसान के जीवन के अन्य आवश्यक खर्च के अनुसार कृषि उत्पादों के एक संतुलित मूल्य भाव के मांग की ही आवश्यकता रहेगी | फिर कृषि उत्पादों के मूल्य भाव को एक सीमा से अधिक बढाया भी नही जा सकता | क्योकी खाध्य प्रदार्थ के रूप में कृषि उत्पाद समस्त आबादी के लिए ग्रामीण एवं शहरी आबादी के लिए आवश्यक है | अत: कृषि उत्पादों के मूल्यों में अधिक वृद्धि और कृषि उत्पादों की बढती महगाई का विरोध गैर कृषक आबादी से उठना स्वाभाविक है , जैसा की आम तौर पर होता भी रहा है | फलस्वरूप कृषि उत्पादों के मूल्य में वृद्धि को एक सीमा तक नियंत्रित रखना भी आवश्यक है |
लेकिन कृषि लागत के बीज , खाद , डीजल ,एवं अन्य ससाधनो के मूल्य को अधिकाधिक घटाने से देश के जनसाधारण आबादी के किसी भी हिस्से को घाटा नही होना है | | वस्तुत: कृषि लागत मूल्य घटाने से इन औद्योगिक एवं तकनीकी मालो , मशीनों , उन्नत बीजो , खादों आदि के उत्पादन व व्यापार की मालिक धनाढ्य कम्पनियों को मिलते रहे उच्च मुनाफो , लाभों में कमी आ जायेगी | उन्हें भी घाटे में नही जाना है | पर इससे आम किसानो को घाटे की स्थितियों से निकलने तथा गैर कृषक हिस्सों को खाद्यानो का संतुलित मूल्यों पर उपलब्ध कराने का सटीक रास्ता जरुर निकल आयेगा | इसीलिए लागत घटाने के लिए धनाढ्य कम्पनियों के लाभों - मुनाफो का घटाया जाना आवश्यक एवं न्यायसंगत है | फिर महगाई कम किये जाने के लिए भी कृषिगत उत्पादों के मूल्यों को ही नही बल्कि औद्योगिक मालो - मशीनों के मूल्यों को भी नियंत्रित किया जाना आवश्यक एवं सर्वथा न्याय संगत है |

फिर महगाई कम किये जाने के लिए भी कृषिगत उत्पादों के मूल्यों को ही नही बल्कि औद्योगिक मालो - मशीनों के मूल्यों को भी नियंत्रित किया जाना आवश्यक है | इसीलिए कृषि उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले बीज खाद एवं अन्य ससाधनो को घटाए जाने की मांग आम किसानो द्वारा एवं गैर कृषक हिस्सों द्वारा भी उठाया जाना चाहिए | इस सम्बन्ध में किसानो को इस महत्वपूर्ण तथ्य पर भी ध्यान देना चाहिए कि कृषि उत्पादों के मूल्य निर्धारण एवं नियंत्रण के लिए कृषि लगत एवं मूल्य आयोग पहले से ही बना हुआ है और वह निरंतर सक्रिय भी रहता है | कृषि उत्पादों के लागत खर्च को जोड़कर वह कृषि उत्पादों के मूल्य को निर्धारित करने के साथ सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य बढाने की सलाह देता रहता है | लेकिन यह आयोग भी कृषि उत्पादों के मूल्य निर्धारण व नियंत्रण के लिए कृषि में प्रयुक्त औद्योगिक एवं तकनीकी मालो - मशीनों के मूल्य को नियंत्रित करने और घटाने की कोई सलाह नही देता है \ दिलचस्प बात यह है कि इस आयोग का नाम ही कृषि लागत एवं मूल्य आयोग है ?
फिर इससे भी ज्यादा दिलचस्प तथा ध्यान देने वाली बात यह है कि कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की तरह औद्योगिक लगत - मूल्य आयोग सम्भवत: बनाया ही नही गया है | अगर कोई ऐसा आयोग बना है तो उसके नाम काम का कभी कोई समाचार देखने को नही मिला | क्या औद्योगिक मालो - सामानों का मूल्य नियंत्रण आवश्यक नही है ? अवश्य है सही कहा जाए तो महगाई कम करने के लिए तथा कृषि लागत के सामानों को कम मूल्य पर मुहैया करने के लिए औद्योगिक मालो समानो तकनीको मशीनों के मूल्य नियंत्रण लगाया जाना आवश्यक है | ऐसा किया जाना आवश्यक है कि औद्योगिक सामानों की मालिक कम्पनिया इन उत्पादों और उनके अधिकाधिक मूल्य एवं बिक्री बाजार से करोड़ो अरबो के मुनाफो एवं पूंजियो की मालिक बनती जा रही है | जबकि उन मालो सामानों की बढती महगाई से जनसाधारण समाज के सभी या बहुसंख्यक हिस्से उसके आवश्यक उपभोग और उपयोग से वंचित हो रहे है | जनसाधारण के सभी हिस्सों को एक अधिकार प्राप्त एवं कारगर औद्योगिक लागत एवं मूल्य आयोग के गठन की और उसके द्वारा औद्योगिक ममालो सामानों के मूल्य नियंत्रण व निर्धारण की मांग उठाना आवश्यक है | खासकर समस्याग्रस्त एवं संकटग्रस्त किसानो को तो कृषि लागत के औद्योगिक एवं तकनिकी मालो सामानों ( खाद , बीज , दवा , डीजल , मशीन उपकरण आदि ) के निर्धारण व नियंत्रण की मांग के साथ ऐसे स्वायत्त आयोग की मांग उठाना आवश्यक है | दोनों मागो को किसान आन्दोलन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण मांग बनाया जाना आवश्यक है | लेकिन इस मूल्य निर्धारण व नियंत्रण का वास्तविक समर्थन उन्हें किसी सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी नेताओं तथा उच्चस्तरीय प्रचार माध्यमि विद्वानों कृषि वैज्ञानिको एवं बहुचर्चित किसान हिमायतियो से नही मिल सकता | लेकिन क्यो ? क्योकि इससे कृषि लागत के औद्योगिक मालो सामानों की मालिक धनाढ्य कम्पनियों के ऊँचे लाभ मुनाफो में गिरावट का आना निश्चित है | इसलिए धनाढ्य कम्पनियों इसे स्वीकार नही करेंगी और न ही उनको शासन सत्ता के जरिये नीतिगत योजनाबद्ध रूप में बढ़ावा देने में लगी सत्ताधारी पार्टियों के उच्चस्तरीय राजनेता अधिकारी व् विद्वान् इसे स्वीकार कर सकते है | वे स्वंय भी इन्ही धनाढ्यो की धन पूंजी के बूते आय - व्यय सुख सुविधा का उपभोग करते है | अपनी सम्पत्तियों सुविधाओं को बढाते रहते है | इसलिए कृषि लगत के खर्च को घटाने की मांग को स्वं की किसानो को ही करना होगा अब फिर से किसानो को लामबंद होना पड़ेगा तभी वो अपनी खेती किसानो को बचा सकता है अन्यथा .........

सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक --