Thursday, April 19, 2018

बाजारीकरण ने नारी के जननी होने की युगों पुरानी गरिमा को कलंकित करने का काम किया है ? 19-4-18

बाजारीकरण ने नारी के जननी होने की युगों पुरानी गरिमा को कलंकित करने का काम किया है ?


पिछले 15-20 सालो से महिला सशक्तिकरण एक बहुचर्चित मुद्दा बना हुआ है | महिलाओं में सुन्दर दीखने - दीखाने का चलन बढ़ता चला जा रहा है | इन सालो में शहरों से लेकर कस्बो तक में व्यूटी पार्लर के बढ़ते सेंटर के साथ नये - नये किस्म के और हर रंग रोगन वाले प्रसाधन के मालो - सामानों का बढ़ता बिक्री बाजार सुन्दर दिखने - दिखाने के इसी चलन को परीलक्षित करता है | इस सन्दर्भ में 8 मार्च के दैनिक जागरण में महिला लेखिका क्षमा शर्मा जी का ''सौन्दर्य केन्द्रित स्त्री विमर्श '' शीर्षक से लेख प्रकाशित हुआ था | लेखिका का कहना है कि महिला सशक्तिकरण के नाम पर औरतो को सुन्दर दिखने और बालीवुड को आदर्श बनाये जाने के कारण भी इन दिनों तमाम उम्र दराज महिलाए भी अपने हाथो , चेहरे और गर्दन की झुरिया मिटवा रही है | औरतो की यह छवि बनाई गयी है कि अगर वे सुन्दर नही है तो किसी काम की नही है | उनका जीवन व्यर्थ है | खुबसूरत दिखने की चाहत कोई बुरी बात नही है , लेकिन सब कुछ भूलकर सिर्फ खुबसूरत दिखने की बात ही अब प्रमुख हो गयी है | ---
महिलाओं को सौन्दर्य के इन उल जुलूल मानको को चुनौती देनी चाहिए थी , मगर ऐसा होते हुए कही दीखता नही | दीखता तो वह है , जिसे स्त्रीवादी नारों में लपेटकर बेचा जाता है और मुनाफ़ा कमाया जा रहा है | --
औरतो का असली सशक्तिकरण उसकी बुद्धि और कौशल से ही हो सकती है , लेकिन जब तक लडकियों को यह सिखाया जाता रहेगा कि तुम्हारे जीवन का मूलमंत्र सुन्दर दिखना भर है , तब तक महिलाओं के सशक्तिकरण की राह आसान होने वाली नही है |
लेखिका ने महिलाओं , लडकियों में सुन्दर दिखाने की बढती प्रवृति को अपने लेख में कई ढंग से उठाया है और उस पर सही व सटीक टिपण्णी तथा आलोचना भी किया है | पर उन्होंने इस प्रवृति व चलन के कारणों व कारको पर लेख में कोई चर्चा नही किया है | फिर उन्होंने इस अंध सौन्दर्यबोध एवं प्रचलन को रोकने के किसी कारगर तरीके को भी नही सुझाया - या बताया है | हाँ यह बात जरुर कही है कि औरत का असली सशक्तिकरण उनके बुद्धिकौशल से ही हो सकता है , न की सौन्दर्य के प्रतिमानों पर खरा उतर कर '|
लेखिका की इस बात में बुद्धि और कौशल के साथ श्रम को भी अनिवार्य रूप से जोड़ा जाना चाहिए | सही बात तो यह है कि पुरुषो व महिलाओं के श्रम ने ही उन्हें और पूरे समाज को सशक्त बनाने का काम किया है | उनके श्रमबल ने ही परिवार और समाज को बुद्धि एवं कौशल के क्षेत्र में भी सशक्त बनाया है | इसके बावजूद श्रम , बुद्धि एवं कौशल को खासकर श्रम व श्रमिक वर्ग की महिला एवं पुरुष को महत्व नही दिया जाता | अधिकाधिक पैसा पाने ,कमाने वाली को कही ज्यादा महत्व मिलता है , जबकि अधिकाधिक श्रम से घर परिवार व समाज को खड़ा करने महिलाओं व पुरुषो को आमतौर पर कोई महत्व नही मिल पाता | वास्तविकता है कि आधुनिक युग में धन - सम्पत्ति , पैसे - पूंजी के साथ उनके द्वारा बढावा दिए जाने वाले मुद्दों - मसलो को ही प्रमुखता मिलती रही है | पैसे , पूंजी तथा उत्पादन बाजार के धनाढ्य मालिको द्वारा नारी सुन्दरता के विज्ञापन प्रदर्शन को बाजार व प्रचार का प्रमुख मामला बना दिया गया है | इसी के फलस्वरूप नारी की दैहिक सुन्दरता और उसके प्रतिमान लडकियों , महिलाओं के आदर्श बनते जा रहे है |
मध्ययुग में सामन्ती मालिको ने नारी और उसकी दैहिक सुन्दरता को अपने भोग - विलास के रूप में अपनाने का काम किया था | उनके चारणों ने वैसे ही वर्णन लेखन को प्रमुखता से अपनाया था | हालाकि उसका असर जनसाधारण पर बहुत कम पडा | लेकिन आधुनिक उद्योग व्यापार के धनाढ्य मालिको ने नारी सुन्दरता को अपने मालो - सामानों के प्रचार विज्ञापन का प्रमुख हथकंडा बना लिया है | उन्होंने पुरुष समाज में नारी की दैहिक सुन्दरता के प्रति बैठे सदियों पुरानी भावनाओं , प्रवृत्तियों का इस्तेमाल अपने मालो - सामानों के विज्ञापनों एवं प्रचारों को बढाने में कर लिया है | बढ़ते माल उत्पादन तथा उसके बिक्री बाजार के साथ नारी सुन्दरता के इस इस्तेमाल का , उसके अधिकाधिक प्रदर्शन का चलन भी बढ़ता जा रहा है | नारी सौन्दर्यबोध के लिए प्रतिमानों के , उन्हें बढाने वाले प्रतिष्ठानों तथा प्रसाधन के ससाधनो की बाढ़ आती गयी है | इसी के साथ नए धंधे के रूप में उच्चस्तरीय फैशनबाजी माडलबाजी को लगातार बढ़ाया जाता रहा है | अंतर्राष्ट्रीय , राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय स्तर पर ब्यूटी क्वीन चुने जाने की चलन सालो साल बढ़ता रहा है | विकसित साम्राज्यी देशो में यह चलन काफी पहले से शुरू हो गया था | इस देश में भी इसका चलन 1980 - 85 के बाद जोर पकड़ता गया है | जैसे - जैसे देश - विदेश की धनाढ्य कम्पनियों को अधिकाधिक छूटे व अधिकार देने के साथ उनके मालिकाने के उत्पादन व बाजार को बढ़ावा दिया जाता रहा है , वैसे - वैसे उन मालो - सामानों के विज्ञापन प्रचार में नारी की दैहिक सुन्दरता का प्रचार बढ़ता रहा है | अर्द्धनग्न रूप में नारी सुन्दरता का प्रचार बढ़ता रहा है | पुरुषो की तुलना में नारियो को माडलों , फिल्मो सीरियलों से लेकर अब आम समाज में कम से कम वस्त्रो के साथ पेश किया जाता है | उपर से नीचे तक फ़ैल रहे या कहिये फैलाए जाते रहे नारी देह की बहुप्रचारित सुन्दरता का इस्तेमाल अब लडकियों , लडको की युवा पीढ़ी को फँसाये रखने के लिए तथा उन्हें जीवन की तथा समाज की गंम्भीर समस्याओं से विरत करने के लिए भी किया जा रहा है | नारी सुन्दरता के साथ यौन सम्बन्धो का खुले रूप में बढाये जाते रहे प्रोनोग्राफी आदि के बढ़ते प्रचारों के जरिये खासकर अल्पव्यस्क एवं युवा वर्ग के लोगो में ''सेक्स का नशा '' बढ़ाया जा रहा है | शराबखोरी एवं ड्रग्स एडिक्शन की तरह इसे एक नशे की तरह आम समाज में उतारा गया है | यह महिला उत्पीडन एवं बलात्कार को बढाने का एक अहम् कारण बनता जा रहा है | इस बात में कोई संदेह नही है कि आधुनिक बाजारवादी जनतांत्रिक युग ने घर परिवार के दायरे में सीमित नारियो को उससे बाहर निकलने का अवसर प्रदान किया है | आधुनिक उत्पादन बाजार , यातायात , संचार , शिक्षा , ज्ञान शासन प्रशासन के क्षेत्रो में तथा अन्य प्रतिष्ठानों कामो , पेशो में भी लडकियों महिलाओं को भागीदारियो करने का अवसर प्रदान किया है | पिता, पति , पुत्र की पहचान से जोड़कर देखी जाने वाली नारी समुदाय को अपने पैरो पर अपनी पहचान के साथ खड़ा होने का गौरव प्रदान किया है | नारी को सशक्त बनाने का काम किया है | लेकिन इसी के साथ आधुनिक युग के बाजारवाद ने उसके अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर के धनाढ्य मालिको संचालको ने नारी के जननी होने की युगों पुरानी गरिमा को गिराने और कलंकित करने का भी काम किया है | उसको मातृत्व की गरिमामयी आसन से उतारकर बाजारी विज्ञापन का वस्तु बनाने का काम किया है | उसकी दैहिक सुन्दरता को कम से कम वस्त्रो में प्रदर्शित करके उस देह में विद्यमान उसकी श्रमशीलता और मातृत्व को महत्वहीन करने का भी काम किया है | ''भोग्या नारी '' के रूप में उस पर हमलोवरो से घिरे समाज की असुरक्षित नारी बनाने का काम किया है |
यह स्थिति आधुनिक युग के विभिन्न क्षेत्रो में महिलाओं की बढती भागीदारी के फलस्वरूप उनके बढ़ते अशक्तिकरण का भी ध्योतक है | ज्यादातर महिलावादी संगठन और नारी स्वतंत्रता समर्थक सगठन आधुनिक युग में महिलाओं के बढ़ते अशक्तिकरण पर , उसके दैहिक सौन्दर्य के बाजारवादी एवं धनाढ्य वर्गीय इस्तेमाल पर और इसे बढावा देने वाली बाजारवादी उपभोक्तावादी संस्कृति पर एकदम नही बोलते | उस पर बढ़ रहे हमलो तथा यौन उत्पीडन के लिए कुछ अराजक तत्वों को ही दोषी मानकर मामले को रफा दफा कर देते है | हालाकि यह मामला आधुनिक युग की बाजार व्यवस्था का तथा उसकी उपभोक्तावादी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है | इस संस्कृति और नारी स्वतंत्रता के नाम पर उसे बढ़ावा देने वाले धनाढ्य एवं उच्च हिस्सों का विरोध किये बिना नारियो का वास्तविक सशक्तिकरण सम्भव नही है |नारी देह की सुन्दरता के बढाये जा रहे बाजारीकरण के साथ नारी सशक्तिकरण सम्भव नही है |
सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक - साभार चर्चा आजकल

Wednesday, April 18, 2018

लगातार छले जा रहे है किसान 18-4-18

लगातार छले जा रहे है किसान
14 मार्च के दैनिक जागरण में प्रकाशित अपने ब्यान में केन्द्रीय जल ससाधन मंत्री श्री नितिन गडकरी ने कहा है कि बड़े बाँध बनाने में मंत्री से लेकर नौकर शाह तक बहुत खुश होते है , लेकिन कमांड एरिया डेवलपमेंट यानी सिचाई के लिए बाँध का पानी खेतो तक पहुचाने के लिए नहर प्रणाली में किसी की रूचि नही है | श्री गडकरी ने आगे कहा कि ''वे बाँध के खिलाफ नही है | लेकिन वे चाहते है कि इससे मिलने वाला शत प्रतिशत जल कृषि उत्पादन को बढाने के काम आये | इसके लिए नहर से लेकर खेतो की नालियों तथा जल के वैज्ञानिक प्रबन्धन पर काम किया जाए ताकि कृषि उत्पादन का बढ़ना निश्चित है | अपने इस ब्यान में उन्होंने अपने मंत्रालय द्वारा त्वरित सिचाई लाभ प्रोग्राम और उसके लिए आवंटित 78000O करोड़ रूपये की 99 परियोजनाओं का भी जिक्र किया | बताने की जरुरत नही है कि सिचाई के लिए घोषित त्वरित एवं दूरगामी परियोजनाए सालो - साल तक लंबित पड़ी रहती है | उनके लिए आवंटित धन को अंशत: व पूर्णत: हजम कर लिया जाता है , मगर वे परियोजनाए आगे नही बढ़ा पाती | इसका सबूत श्री गडकरी के ब्यान में स्पष्ट झलकता है | उन्होंने उसे सिंचाई के लिए बाँधो से कमांड एरिया की नहरों नालियों के विकास में रूचि न लेने की बात कही है | हालाकि यह रूचि लेने का या न लेने का मामला नही है और न ही मामला प्रान्तों के मंत्रियो अधिकारियों तक सीमित ही है | वस्तुत: मंत्रियों , अधिकारियो में सिचाई के विकास विस्तार के प्रति अरुचि व निष्क्रियता कृषि विकास और उसके लिए सरकारी निवेश एवं सार्वजनिक योजनाओं के क्रियान्वन में की जाती रही नियोजित कम - कटौती का नतीजा है | इसे केन्द्रीय जल ससाधन मंत्री बेहतर जानते है उनके लिए यह बात अनजानी नही हो सकती कि 1990 के दशक से ही सार्वजनिक सिंचाई योजनाओं , प्रोग्रामो को हतोत्साहित करते हुए किसानो को सिचाई के लिए स्वंय अपना निजी ससाधन ( अर्थात निजी पम्प सेट ) लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता रहा है | नहरों एवं सरकारी ट्युबेलो को विस्तार देने या उसे बनाये रखने का काम भी ठप्प या लगभग खत्म कर दिया गया है | बजट और बजट से इतर घोषित सार्वजनिक सिचाई योजनाओं को मुख्यत: कागजी या बयानबाजी की घोषणाओं में बदल दिया गया है | इन तथ्यों के बाद श्री गडकरी के यह कहने कि गुंजाइश कहाँ रह जाती है कि सिचाई के लिए कमांड एरिया डेवलपमेंट में मंत्रियों एवं नौकरशाहों को कोई रूचि नही है | अगर केन्द्रीय व प्रांतीय सरकारे पहले की तरह सार्वजनिक सिचाई योजनाओं को बढावा देने में लगी रहती तो मंत्रियों व अन्य नौकर शाहों को उसे आगे बढ़ाना पड़ता | उसके विकास में रूचि लेनी पड़ती | बशर्ते की पहले से निर्मित नहर प्रणाली को कारगर बनाये रखा जाता | खेती के सूखने से पहले ही नहरों का सूखापन खत्म किया जाता |
लेकिन जब कृषि क्षेत्र में सरकारी निवेश घटाने के साथ सार्वजनिक सिचाई को काटने घटाने का नीतिगत एवं योजनागत काम किया जाता रहा तब शासकीय प्रशासकीय हिस्सों से तब नहरों एवं सार्वजनिक नलकूपों का कारगर बनाने की कोई उम्मीद नही की जा सकती | सार्वजनिक सिचाई और कमांड एरिया विकास के प्रति मंत्रियों अधिकारियो में रूचि पैदा नही की जा सकती | श्री गडकरी जी के ब्यान में इस अरुचि को आगे करके सभी सरकारों द्वारा पिछले 20 - 25 सालो से कृषि व सार्वजनिक सिचाई में निरंतर की जाती राजी कटौती की सुनियोजित नीतियों व योजनाओं पर पर्दा डालने का कम किया गया है |

बड़ा कौन ? अमेरिका या विश्व व्यापार सगठन ? 18-4-18

बड़ा कौन ?
अमेरिका या विश्व व्यापार सगठन ?
अम्रीका की पाली - पोसी बिल्ली ( डब्लू टी ओ ) पर गुर्राने की हिम्मत कैसे कर सकती है ?
अमेरिका ने चन्द दिन पहले ही दूसरे देशो से अमरीका में होने वाले स्टील व अलमुनियम पर आयात शुल्क बढ़ाकर उस पर लगाम लगाने की घोषणा किया | फलस्वरूप इन देशो के स्टील व अलमुनियम के अमरीकी व्यापार बाजार में कमी आनी स्वाभाविक है | अमरीका ने यह घोषणा अपने देश के स्टील व अलमुनियम उद्योग को सरक्षंण देने के नाम पर किया है | उसकी घोषण से चीन , भारत जैसे देशो के स्टील , अलमुनियम उद्योग और उसका अंतर्राष्ट्रीय निर्यात भी जरुर प्रभावित होगा | इस देश के प्रचार माध्यमो में इस पर चिंता भी की जा रही है | अमरीका के सरक्षणवादी कदम पर इस देश द्वारा तथा कई अन्य देशो द्वारा विरोध जताया गया है | इसे विश्व व्यापार सगठन ( डब्लू टी ओ ) की बैठक में उठाने की बात भी की गयी है | लेकिन अमेरिका और वहाँ के शासन प्रशासन ने उसे अनसुना करते हुए डब्लू टी ओ को ठेंगा दिखा दिया | अमरीका प्रशासन ने डब्लू टी ओ पर यह कहकर हमला कर दिया कि डब्लू टी ओ एक अप्रभावी व्यवस्था है | अमरीका ने डब्लू टी ओ के नियमो , करारो की परवाह किये बिना भारत सहित कई देशो के विरुद्ध कारोबारी जंग की धमकी दी है | 19 मार्च को विश्व व्यापार सगठन के महानिदेशक श्री अजवेदों भारत द्वारा आयोजित दो दिवसीय लघु मंत्री मंडलीय सम्मेलन में भाग लेने दिल्ली आये हुए थे | भारतीय बड़े उद्योगों के सगठन (सी आई आई) द्वारा आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने अमरीका द्वारा डब्लू टी ओ की अवहेलना तथा आलोचना की चर्चा पर कहा कि अमरीका डब्लू टी ओ का समर्थन करता है | उन्होंने कहा कि सगठन की कार्य प्रणाली को लेकर अमरीका की कुछ चिंताए है | उन्होंने उसे रेखांकित करते हुए कहा कि'अमरीका का कहना है 1995 में डब्लू टी ओ के वजूद में आने के बाद दुनिया में तमाम अहम् बदलाव हुए है | उन्हें देखते हुए इस सगठन में कुछ उन्नयन व सुधार की जरूरत है
ध्यान देने लायक बात है कि डब्लू टी ओ में उन्नयन व सुधार की बात खुद डब्लू टी ओ के महानिदेशक व अन्य पदाधिकारियों ने तथा अन्य सदस्य देशो ने नही बल्कि अमरीका ने ही कहा है | अमरीका ने यह बात डब्लू टी ओ को निष्प्रभावी कहते हुए तथा उसके न्यायाधिशो की नियुक्तिमें व्यधान डालते कही है |
यह है अमरीका और सभी देशो से बराबर का बर्ताव का दावा करने वाले वैश्विक सगठन डब्लू टी ओ में अंतर | विश्व व्यापार सगठन अगर मिमियाता हुआ अमरीका की चिंता को स्वीकार कर रहा है तो अमरीका गुर्राने के अंदाज में उसे निष्प्रभावी बता रहा है | स्वाभाविक है कि इसमें दबना डब्लू टी ओ को ही है | उसे ही अमरीका सुझाव के अनुसार डब्लू टी ओ के न्यायाधिशो की नियुक्ति करना और फिर सगठन के तथा कथित उन्नयन का प्रस्ताव देना है | फिर उसे बहुसंख्यक देशो से स्वीकार करवाना है |
डब्लू टी ओ नाम की संस्था 1995 से पहले अंतर्राष्ट्रीय व्यापार सगठन को सचालन के लिए बने एक ढीले - ढाले सगठन - गाट ( व्यापार एवं चुंगी पर आम समझौता ) थी उसी सगठन को 1995 से पहले विश्व व्यापार सगठन में बदल दिया गया था | इस सगठन के महानिदेशक के जरिये दिए गये डंकल प्रस्ताव पर सदस्य देशो की सहमती लेने का भी काम किया गया था | क्या यह काम मुख्यत: डब्लू टी ओ के पधाधिकारियो ने किया था ? नही , इस सगठन को आगे करके यह यह काम अमरीका के नेतृत्व में सभी विकसित साम्राज्यी देशो ने किया था | 1989 में सोवियत रूस के पतन के बाद अपने वैश्विक व्यापार एवं वैश्विक प्रभाव प्रभुत्व को बढाने के लिए किया था | फलस्वरूप अमरीका को डब्लू टी ओ पर गुर्राने और डब्लू टी ओ के मिमियाने पर कोई आश्चर्य नही होना चाहिए | आखिर अमरीका की पाली पोसी बिल्ली उसी पर गुर्राने की हिम्मत भला कैसे कर सकती है ?

Monday, April 16, 2018

गिलोटिन प्रणाली से बजट पास -- 16-4-18

गिलोटिन प्रणाली से बजट पास --
देश के प्रधान को आम आदमी की कोई चिन्ता नही -
मार्च के दूसरे सप्ताह में लोक सभा ने केन्द्रीय बजट को बिना किसी चर्चा - बहस के 30 मिनट में पास कर दिया | इसके अंतर्गत 89 .23 लाख करोड़ रूपये की व्यय योजना के साथ वित्त विधेयक एवं विनियोग विधेयक को पास कर दिया गया | बजट में 99 केन्द्रीय मंत्रालयों और विभागों की बजट माँगो के साथ लगभग 200 सशोधनो को भी पास कर दिया | सरकार का नेतृत्व कर रही भाजपा को सदन में बजट के विभिन्न पहलुओ पर किसी चर्चा - माँग तथा सवाल - जबाब का सामना नही करना पडा | क्योकी विपक्ष द्वारा पंजाब नेशनल बैंक घोटाला को लेकर तथा आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने जैसे मुद्दे को लेकर की जाती रही माँगो , हंगामो तथा सत्ता पक्ष द्वारा उसे अनसुना करते रहना के फलस्वरूप लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाई लगातार बाधित होती रही | दोनों सदनों के अध्यक्ष सदन की बैठको को बार - बार स्थगित करते रहे |
सरकार ने इस स्थिति का लाभ उठाकर लोकसभा अध्यक्ष की सहमती के साथ बिना किसी बहस चर्चा के ही बजट पास करवा दिया | हालाकि इसके लिए अभी 5 अप्रैल तक का वक्त था | बिना किसी बहस के संसद में बजट पास करने की इस प्रणाली को गिलोटिन प्रणाली का नाम दिया गया है इस प्रणाली के जरिये इस बार के बजट को लेकर तीन बार का बजट पास किया जा चूका है | 2003 - 2004 भाजपा नेतृत्व की राजग सरकार के कार्यकाल के दौरान तथा 2013-14 में कांग्रेस के नेतृत्व के कार्यकाल के दौरान भी ऐसा ही किया गया था | बिना किसी चर्चा या बहस के या कम से कम चर्चा - बहस के साथ बजट पास करने की यह प्रणाली अचानक नही खड़ी हुई है | यह प्रणाली पिछले 20 - 25 सालो में लगातार चलने वाली एक परिपाटी का रूप धारण कर चुकी है | जबकि इससे पहले खासकर 1990 से पहले बजट के मुद्दों पर , उसमे किये गये सशोधनो पर कई दिनों तक चलते चर्चाओं समाचारों - सूचनाओं के साथ बजट के मुद्दे साधारण पढ़े - लिखे लोगो में भी चर्चा - बहस का मुद्दा बना करता था | लेकिन 1991 - 95 के बाद से इस चलन में बदलाव आता गया | प्रश्न है कि यह बदलाव क्यो आया ? थोड़ी मांग व चर्चा के साथ आनन - फानन में बजट पास करने का चलन क्यो चलाया गया ? क्या इसके लिए लिए सदन में पक्ष विपक्ष के बीच विभिन्न मुद्दों को लेकर आये दिन खड़ी होती रही हठधर्मिता , विभिन्न मुद्दों को लेकर मचता शोर शराबा आदि ही जिम्मेदार है | निसंदेह: ऐसी स्थितियाँ तथा सता पक्ष और विपक्ष के सासंदों का अराजकतापूर्ण रवैया भी इसके लिए जिम्मेदार है | लेकिन इसका आसली कारण दूसरा है |
वह कारण देश में 1991 में लागू की गयी अंतरराष्ट्रीय आर्थिक नीतियों और 1995 में लागू किये गये विश्व व्यापार सगठन के अंतरराष्ट्रीय प्रस्ताव ( डंकल प्रस्ताव के प्राविधानो ) में निहित है | 1995 के बाद से सभी सरकारों द्वारा इन नीतियों एवं प्रस्तावों एवं उसके अगले चरणों अनुसार ही बजटीय प्राविधानो को बनाया व पास किया जाता रहा है | डंकल प्रस्ताव को भी संसद में बिना चर्चा बहस के ही लागू किया गया था | नई आर्थिक नीतियों एवं डंकल प्रस्ताव को देश के आधुनिक विकास हेतु वैश्विक सम्बन्धो को अधिकाधिक बढाये जाने की आवश्यकता को बताते हुए लागू किया गया था | उसके अनुसार ही देशी व विदेशी निदेशको को अधिकाधिक छूट व अधिकार देने तथा जनसाधारण के हितो को निरंतर काटने घटाने के बजटीय एवं गैरबजटीय प्राविधानो को आगे बढ़ाया जाता रहा है | इन नीतियों तथा प्रस्तावों के प्राविधानो और उसे आगे बढाने के बजटीय एवं गैरबजटीय निर्धारण में मोटे तौर पर सभी सत्ताधारी पार्टिया एक जुट रही है | हालाकि वामपंथी पार्टिया इनको साम्राज्यी एवं पूंजीवादी नीतियों और उसी के अनुसार किये गये बजटीय प्राविधानो कहकर उसका जबानी विरोध करती रहती है | लेकिन उनके वाममोर्चे की सरकार उसे अपने शासन के प्रान्तों में लागू करने में पीछे नही रही | उसे वे अपनी मज़बूरी बताकर नही बल्कि अन्य पार्टियों की तरह ही प्रांतीय क्षेत्र विकास के लिए आवश्यक बताकर लागू करती रही | इन स्थितियों में बजट के मुद्दों को लेकर खासकर बड़े मुद्दों को लेकर चर्चा - बहस का कोई मामला अब नही रह जाता | मुख्यत: इसीलिए बजट पर अब संसद से लेकर समाचार पत्रों एवं अन्य प्रचार माध्यमो में बजट पेश होने के बाद एक दो दिन तक ही चर्चा चलती है , फिर उस पर कोई चर्चा नही चलती | लोगो के बजट में जनहित के मुद्दों की निरंतर की जाती रही उपेक्षा से लोगो का ध्यान हटाने के लिए भी बजटीय प्राविधानो पर चर्चा नही किया जाता है | यही कारण है कि संसद में बजट पेश होने से पहले या पेश होने के तुरंत बाद दुसरे मुद्दों को लेकर हंगामा खड़ा कर दिया जाता है | उसी हंगामे के बीच थोड़ी - बहुत चर्चा के साथ या बिना चर्चा किये ही बजट पास करने और उसके लिए प्रयुक्त की गयी गिलोटिन प्रणाली का प्रमुख कारण संसद का हल्ला हंगामा नही ,, बल्कि बजट पास करने उसकी चर्चाओं से जनसाधारण का ध्यान हटाने के लिए चलाई जा रही वर्तमान परिपाटी है |
सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार

Saturday, April 14, 2018

लामबंद होता किसान 14-4-18

लामबंद होता किसान

महाराष्ट्र में लगभग 40.000 किसानो ने नासिक से मुंबई तक की 200 किलोमीटर की पदयात्रा करके 11 मार्च को मुंबई की सडको पर मार्च किया | उन्होंने अपनी मांगो को लेकर महाराष्ट्र विधान सभा को घेरने का निश्चय किया था | लेकिन वैसी स्थिति आने से पहले ही महाराष्ट्र सरकार के मुख्यमंत्री ने उनकी कुछ मांगो को मानते हुए और कुछ पर सहानुभूति पूर्वक विचार करके उन्हें मनाने का आश्वाशन देकर वहाँ से विदा किया |
किसानो की इस पदयात्रा आन्दोलन को हिंदी व अंग्रेजी समाचार पत्रों ने कम जगह दी | ज्यादातर समाचार पत्रों ने 11 मार्च को मुंबई में किसानो के पहुचने के बाद ही उसे समाचार के रूप में प्रकाशित किया | यह बड़े प्रचार माध्यमो द्वारा किसानो और उनके आंदोलनों के प्रति उपेक्षा पूर्ण रवैये को ही प्रदर्शित करता है | उनका यह उपेक्षा पूर्ण रवैया इस रूप में भी प्रदर्शित हुआ है कि किसी भी समाचार पत्र ने उनकी सभी मांगो को प्रकाशित नही किया है | इसीलिए उनकी मांगो के बारे में भी पूरी जानकारी नही मिल पाई | मोटे तौर पर उनकी मांगो में हर तरह के कृषि ऋण की माफ़ी , वन अधिकार अधिनियम लागू किये जाने , कृषि उद्पादों के लिए लाभप्रद मूल्य तय किये जाने , स्वामीनाथन आयोग के सुझावों को लागू करने की , नदी जोड़ योजना के जरिये सार्वजनिक सिंचाई को बढावा देने की , विभिन्न परियोजनाओं के लिए कृषि का अधिग्रहण रोकने आदि की मांगे शामिल है | महाराष्ट्र सरकार ने इन मांगो पर विचार कर उसे पूरा करने के लिए छ: माह का समय लिया है | ध्यान देने वाली बात है कि महाराष्ट्र पिछले 7 - 8 सालो से किसानो की आत्महत्या का सबसे अग्रणी प्रान्त बना हुआ है | पर वहाँ की सरकारे इस बात की अनदेखी करती रही है | देश की केन्द्रीय व अन्य प्रांतीय सरकारे भी किसानो के बढ़ते संकटो , समस्याओं की तथा 1995 से उनमे बढ़ते रहे आत्महत्याओं की अनदेखी करती रही है | इन स्थितियों एवं उपेक्षाओ को देखते हुए अब विभिन्न पार्टियों एवं मोर्चो सरकारों द्वारा किसानो को दिए आश्वासन विश्वसनीय नही रह गये है | अभी पिछले साल महाराष्ट्र सरकार द्वारा कर्जमाफी योजना के तहत 340 अर्ब रूपये का पॅकेज घोषित किया गया था | लेकिन उसमे से अब तक केवल 138 करोड़ रूपये के ही कर्जो का माफ़ होना भी इसी का परीलक्षण है |

इसे देखते हुए इस बात की उम्मीद नही कि अगले छ: माह में महाराष्ट्र की सरकार या देश - प्रदेश की अन्य सरकारे किसानो की समस्याओं एवं उनकी मांगो का कोई भी संतोषप्रद समाधान प्रस्तुत करेगी | इसकी उम्मीद इसलिए भी नही है कि देश के तीव्र आर्थिक वृद्धि व विकास के नाम पर कृषि क्षेत्र के महत्व को लगातार घटाया जा रहा है | कृषि भूमि शहरीकरण करने तथा ढाँचागत परियोजनाओं एवं निजी औद्योगिक व्यापारिक क्षेत्र को विकसित करने के नाम पर उसको संकुचित किया जा रहा है | वनों की भूमि पर भी उद्योग व्यापार के धनाढ्य मालिको , माफियाओं द्वारा कानूनी व गैरकानूनी तरीको से कब्जा किया जाता रहा है | कृषि लागत मूल्य को अनियंत्रित रूप से बढने की छुट देते हुए तथा कृषि उद्पादों के मूल्यों पर अधिकाधिक नियन्त्रण करते हुए सरकारों द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य को भी मुख्यत: घोषणाओं तक ही सीमित किया जा चूका है | फलस्वरूप खेती - किसानी के लागत की और जीवन की अन्य आवश्यक आवश्यकताओ की पूर्ति के लिए किसानो का सरकारी व् महाजनी कर्ज के संकटो में फसना इनकी नियति बन गयी है | इस कर्ज संकट से और कभी - कभार की कृषि ऋण माफ़ी से उन्हें कर्ज की निरंतर बढती आवश्यकता और फिर उसमे बढ़ते फसांन से मुक्ति नही मिल सकती है | कई प्रान्तों में कर्ज माफ़ी की घोषणाओं और उनके थोड़े या ज्यादा क्रियान्वयन के वावजूद किसानो की आत्महत्या जारी है | स्वामीनाथन आयोग भी किसानो के बढ़ते लागत खर्च को घटाने का कोई सुझाव नही प्रस्तुत करता | इसलिए आयोग के सुझावों को मान लेने के बाद भी किसानो का संकट कम होने वाला नही है | यह इसलिए भी कम होने वाला नही है कि कृषि विकास की योजनाओं की नीतियों को आगे बढाने और उसके लिए सरकारी धन के निवेश की प्रक्रिया को 1990 के दशक से ही घटाया जा रहा है | कृषि ऋण की मात्रा को बढाते और उसे लाखो करोड़ में पहुचाते हुए सरकारी निवेश को निरंतर घटा रही है सरकारे | इसलिए किसानो को अब अपने हितो के प्रति कहीं ज्यादा सजग और सगठित व आंदोलित होने की आवश्यकता है | महाराष्ट्र के किसानो ने अपनी पदयात्रा आन्दोलन में इसे प्रदर्शित कर दिया है | लेकिन अभी उसे वहाँ की अखिल भारतीय किसान सभा का एक तात्कालिक प्रयास ही माना जाएगा | हाँ ! यह प्रयास घनात्मक है | क्योकि इसने किसानो की पहचान को जाति - धर्म की पहचान के आगे खड़ा कर उन्हें अपनी मांगो के लिए लामबंद कर दिया है | इसके पीछे कोई राजनीतिक या गैर राजनीतिक सगठन हो या न हो लेकिन अगर यह प्रक्रिया चलती रही तो किसान स्वत: एक व्यापक एक प्रभावकारी आन्दोलन के रास्ते आगे बढ़ जाएगा | लेकिन यह काम निरंतर चलने वाले किसान आन्दोलन का रूप तब तक नही ले सकता , जब तक किसानो की स्थानीय स्तर पर स्थायी समितिया नही बनती | उनमे अपनी समस्याओं पर विचार - विमर्श के साथ उनके समाधान की मांगे नही खड़ी की जाती | अन्य क्षेत्रो की किसान समितियों के साथ उनके अधिकाधिक जुड़ाव व सहयोग को निरंतर बढाते हुए किसान आन्दोलन की रणनीतियो को निर्धारित नही किया जाता | उन रणनीतियो कार्यनीतियो को लेकर आगे बढने का प्रयास होना जरूरी है |
सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक - आभार चर्चा आजकल की

Thursday, April 12, 2018

हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए- --- जयशंकर गुप्त 12-4-18

हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए- --- जयशंकर गुप्त
शार्प रिपोर्टर मिडिया समग्र मंथन के दूसरे दिन लोकतंत्र , ''साहित्य और हमारा समय '' विषय पे लोकबन्धु के सम्पादक समाजवादी चिन्तक जयशंकर गुप्त जी ने अपने बात दुष्यंत के इन लाइनों ने हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगीशर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए शुरुआत करते हुए कहा किइस आजमगढ़ की धरती का बहुत कर्ज है मुझ पर मैं इस कर्ज को उतार नही पाउँगा मैंने डंके की चोट पर कहता हूँ मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ वही बात आपको सुनाता हूँ , आप सबको याद दिलाना चाहता हूँ आज से चार साल पहले माननीय मोदी जी ने कहा था कि राजनीति का अपराधीकरण खत्म करूंगा पर आज संसद में ३६% अपराधी संसद में बैठे जिनके खिलाफ अपराधिक मुकदमे चल रहे है , लेकिन हमारे प्रधानमन्त्री जी को संसद में कोई अपराधी नजर नही आ रहा है इन चार सालो में एक भी अपराधी जिसकी सदस्यता रद्द की गयी क्या ? मुझे तो ऐसा नजर नही आया मैं चुनौती के साथ कहता हूँ आज के समय में कोई स्वंय की चर्चा करता है क्या कभी न्यायपालिका के लोग स्वंय का आत्म मूल्याकन करते है अध्यापक वर्ग स्वंय कभी चिंतन करता है पुलिस कभी स्वंय आत्म मंथन करती है अपने लिए वह क्या कर रही है ? लेकिन पत्रकार आज भी स्वंय के लिए आत्म मंथन करता है तभी यह लोकतंत्र बचा हैउन्होंने आगे कहा कि यही इस देश की ताकत है हम अपना आत्म अवलोकन करना जानते है | क्या मजाक है देश की संसद में बजट का दुसरा सत्र चला ही नही और सब काम सम्पन्न हो गया सरकार यही चाहती है जो कानून अस्तित्व में नही है वो कानून पास हो गया विडम्बना है हमारे देश में लोकतंत्र मजाक बनकर रह गया है यह हाल है हमारे संसद का आज न्यायपालिका का हाल देख ले , यही नही आज जो स्थिति बन रही है यह लोग पूरी मीडिया को अपने कंट्रोल में लेना चाहते है यह जो बोले बीएस मिडिया भी यही बोले लेकिन वो लोग यह भूल रहे है यह देश क्रांतिवीरो का रहा है और आज भी अपनी लेखनी से सच कहने वाले बगावत करते रहेंगे | आज क्या हो रहा है जो सच बोल रहा है या तो उसकी हत्या कर दी जा रही है या तो उसे खरीदने की कोशिश हो रही है | इसी क्रम को आगे बढाते हुए भडास मीडिया के सम्पादक यशवंत सिंह ने कहा दुनिया में इस तकनीक ने बड़ा काम किया है इसी तकनीक का ही कमाल है दुनिया के बड़े - बड़े घोटाले खोलने का पनामा पेपर हो या अन्य घोटाले अंतरराष्ट्रीय रिश्ते डिजिटल मीडिया ने ही बनाये यशवंत सिंह ने कहा अब युद्ध का तरीका बदल गया है अगर आपको लड़ना है तो डिजिटल से युद्ध लादे हमारे स्वंय की आवाज पर कौन प्रतिबंद्ध लगा सकता है हम अपने विचारों को सोशल मीडिया ब्लोग्स के जरिये लड़ेंगे प्रशांत राजा ने कहा कि आज हमारी आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है पहले क्या अखबार के मालिकान पहले से बड़े थे नही जब से उन्होंने अपनी नैतिकता बेचीं वो बड़े अमीरों में अ गये आज दैनिक जागरण , भाष्कर , हिन्दुस्तान अन्य बड़े अखबार वो मूल रूप से शुध्ह व्यापार कर रहे हो वो पत्रकारिता नही कर रहे है पर इसी मिडिया से उम्मीद भी है इनमे आज भी बहुत से साथी बहादुरी से पत्रकारिता को उसके आयाम को जिन्दा रखे हुए है | ''आजतक '' के रामकिंकर सिंह ने कहा आज सुन्च्नाओ का दौर ज्यादा है परम्परागत मीडिया सूचनाओं को फ़िल्टर करे जो सुचना आप तक पहुच रही है यह निर्णय तो आपको लेना होंगा उन सूचनाओं पर , देश के लोकतंत्र में बड़ी ताकत है अगर मिडिया इतना ही गलत होता तो देश की जनता आपसे प्रश्नों की बौछार कर देती यह सच है मिडिया बिकी है पर इन्ही में से कुछ लोग ज़िंदा है जब तक मिडिया समग्र मंथन जैसे कार्यक्रम होते रहेंगे तब तक सच माने पत्रकारिता का मानक जिन्दा रहेगा | इसी क्रम को आगे बढाते हुए अखिलेश अखिल ने कहा अगर पत्रकारिता में मिशन नही तो पत्रकारिता नही हो सकती जिसमे पत्रकार के पास मिशन नही , निष्पक्ष नही निडरता नही वो मात्र दलाल हो सकता है वो पत्रकार हो ही नही सकता |अनामी शरण ने कहा कि आज हर आदमी मोबाइल्ची बन गया है पूरा समाज इस नशे का आदि बन गया है यह चाल पूंजीपतियों का है हमारे समाज को नपुंसक बनाने का जब हम चिंतन नही करेंगे तब हम विरोध कैसे करेंगे इसी लिए आम समाज को ऐसे नशे की आदत दाल दो जिसमे चिंतन ही न हो ताकि आम आदमी सत्ता शासन से सवाल ही न करे ,उन्होंने आगे कहा कि संघर्ष छोटे - छोटे शहरों से ही शुरू होता है अब यह युद्ध इसी आजमगढ़ से मिडिया समग्र मथन के द्वारा शुरू हो चूका है मुझे पूरा भरोसा है यह आगे चलकर एक नये आन्दोलन का इतिहास बनेगा |
कार्यक्रम में प्रो ओमप्रकाश ,प्रो ऋषभदेव शर्मा , अतुल मोहन समदर्शी अमर उजाला लखनऊ क्रान्तिकारी अधिवक्ता दीनपाल राय आदि लोगो ने अपने विचार व्यक्त किये |
शार्प रिपोर्टर द्वारा साहित्य , गजल व पत्रकारिता के क्षेत्र में दस लोगो को अवार्ड से नवाजा गया | डा योगेन्द्र नाथ शर्मा ( राहुल सांस्कृत्यायन साहित्य सम्मान ) गिरीश पंकज ( मुखराम सिंह स्मृति पत्रकारिता सम्मान ) जयशंकर गुप्त ( गुन्जेश्वरी प्रसाद स्मृति पत्रकारिता सम्मान ) प्रो देवराज (भगवत शरण उपाध्याय स्मृति साहित्य सम्मान ) प्रो ऋषभदेव शर्मा ( विवेकी राय साहित्य सम्मान ) पुण्य प्रसून बाजपेयी ( सुरेन्द्र प्रताप सिंह टी .वी पत्रकारिता सम्मान ) यशवंत सिंह ( विजय शंकर वाजपेयी स्मृति पत्रकारिता सम्मान ) विजय नारायण जी ( शार्प रिपोर्टर लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड ) सतीश रघुवंशी ( शार्प रिपोर्टर युवा पत्रकार सम्मान ) डा मधुर नजमी ( अल्लामा शिब्ली नोमानी स्मृति अदबी अवार्ड ) से समानित किया गया |

Tuesday, April 10, 2018

आज का बुद्धिजीवी वेश्या बन गया है - पूर्व डी जी पी - प्रकाश सिंह 10-4-18

आज का बुद्धिजीवी वेश्या बन गया है - पूर्व डी जी पी - प्रकाश सिंह
आजमगढ़ : आजमगढ़ की धरती बड़ी उपजाऊ है इस धरती से कला मनीषियों के साथ साहित्य के मनीषियों को जन्म दिया है मैं इस धरती पर आया यह मेरा सौभाग्य है मैं इस धरती को प्रणाम करता हूँ उक्त विचार नेहरु हाल में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमीनार मिडिया समग्र मंथन में अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्व विद्यालय वर्धा के प्रोफ़ेसर देवराज ने कहा उन्होंने आगे कहा कि यह धरती अदभुत धरती है जहां खड़ी बोली के रचियता आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय , घुमक्कड़ शास्त्र व अनेक भाषाओं के ज्ञाता और स्वतंत्रता आन्दोलन में अपनी भूमिका निभाने वाले महाज्ञानी राहुल सांस्कृत्यायन , प्रगतिशील शायर कैफ़ी आज़मी जैसे विभूतियों की है मैं इस मंच से अपील के साथ आपकी सहमती चाहता हूँ कि यहाँ पर आवासीय व शोध स्तर के विश्व विद्यालय की स्थापना होनी चाहिए प्रो देवराज ने कहा कि आज देश की शासन सत्ता समाज के हर क्षेत्र में अपना हस्तक्षेप जारी रखे हुए है जो देश के लिए शुभ संकेत नही है | बाबा साहेब आंबेडकर , डा लोहिया नरेंद्र देव की चर्चा करते हुए कहा कि बाबा साहेब ने कहा था कि ऐसा लोकतंत्र होना चाहिए एक व्यक्ति एक वोट न हो बल्कि एक व्यक्ति एक मूल्य हो व्यक्ति के साथ मूल्य का जुदा होना आवश्यक है लेकिन देश के नेताओं ने पिछले 70 सालो में इसको बदल दिया या मूल्य बदलने की कोशिश में लगातार लगे हुए है लोहिया जी ने सौन्दर्य दृष्टि से मुख्य धारा में बदलने की पैरवी की थी उनका कहना था कि आंतरिक सौन्दर्य यथार्थ , वास्तविक जीवन धारा से जोड़ता है , वह महत्वपूर्ण है आचार्य नरेंद्र देव जी ने कहा था कि विचारों की आवश्यकता है उसके साथ ही विचारों को स्वतंत्रता मिलनी चाहिए डा देवराज ने आगे कहा कि हमने लोकतंत्र को वोट तंत्र में बदल दिया है जिसके कारण जो लोकतंत्र वास्तविक है ही नही इस व्यवस्था को लोग बदलते चले जा रहे है अगर समय रहते चेता नही गया तो यह लोकतंत्र मात्र नाम का रह जाएगा आज के समय में मिडिया का विस्तार हुआ है पर मिडिया वास्तविक सरोकारों से नजरे चुराता है पत्रकारिता की जो प्रतिबद्धता है राजनीतिक , सामाजिक यथार्थ से मिडिया आज भागता है लोकतंत्र में लोक की भागीदारी कम हुई है जिसके कारण शिक्षा संस्कृति को बहुत बड़ा नुक्सान हो रहा है संस्कृति से ही हमारे जीवन के सारे पक्ष शुरू होते है अब मीडिया परिष्कृत नही रहा गया मीडिया इसमें भी असफल रहा | उन्होंने आगे कहा कि लोकतंत्र का भाषा से सम्बन्ध आज कम हुआ है इस मामले में मीडिया का गहरा असर है आज हमारी कला - संस्कृति के साथ भयानक साजिश हो रही है यही कला और संस्कृति मानव चेतना को जगाने का काम करती है | क्रम को आगे बढाते हुए उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह ने कहा कि कहने को तो देश में लोकतंत्र है पर वो कही नजर नही आता देश के आला अधिकारी और नेता इस लोकतंत्र को कमजोर करने में लगे है , देश की अवाम को इस बात को समझना चाहिए अगर वो अपनी समझदारी नही खोलते है तो एक दिन बस नाम मात्र का लोकतंत्र देश में रह जाएगा पिछले तीन लोकसभा चुनाव का अगर हम आकलन करे तो हम पायेंगे 24% 30% 34% अपराधी लोग देश के उच्च सदन में बैठे है इन अपराधिक पृष्ठ भूमि के लोगो से देश क्या उम्मीद कर सकता है यह जो कुछ भी करंगे सिर्फ अपने लिए यह लोग दिखाने के लिए देश की तरक्की की आशा देते है पर यह लोग अपने धर्म , जाति क्षेत्र से बाहर की सोच रखते ही नही वर्तमान में लोकसभा का चरित्र बदल रहा है | मेरा मानना है अगर ऐसे ही रहा तो हमारा लोकतंत्र के बजाये यह देश क्रिमनल स्टेट बन जाएगा , पूर्व डी जी पी प्रकाश सिंह ने आगे कहा कि ऐसी ससंद किसलिए जहाँ पर कुछ काम नही हो रहा है यहाँ पर बस लोकतंत्र की कब्र खोदने का काम हो रहा है | अगर यही हाल रहा तो एक दिन कोई तानाशाह नेता आएगा और पूरे देश को अपनी मुठ्ठी में कर लेगा इस देश के बौद्धिक वर्ग को इसपे मंथन करना चाहिए पर ठीक इसके उल्टा हो रहा है यह बौद्धिक लोग बौद्धिक वेश्यावृति करने लगे है इन्हें जहाँ से पैसा मिलेगा यह बस उसी का गुणगान करेंगे | अगर लोग नही जगे तो आने वाले समय में भूल जाइए देश की आजादी को साथ ही लोकतंत्र को देश के लोकतंत्र में दीमक लग चूका है अब बारी है इस दीमको को साफ़ करने का , आजादी में हिन्दी मीडिया का महत्वपूर्ण रोल रहा है लेकिन अब पत्रकारिता के चरित्र में बड़ा बदलाव आया है यह चिंता का विषय है इसमें नैतिकता का दायरा सिमट रहा है | अगर मिडिया में खबर छपवानी है तो कुछ दान - दक्षिण दीजिये आपकी खबर छप जायेगी अब मिडिया का ऐसा रोल हो गया है | देश में विकास तो हो रहा है पर कुछ लोग मात्र अपना विकास कर रहे है | आज अगर पत्रकारिता बची है तो मात्र लघु पत्र और पत्रिकाओं के बदौलत समाजवादी विचारक गोपाल राय ने सम्बोधन करते हुए कहा कि मीडिया राजनैतिक सत्ता से प्रभावित रहता है जिसमे 72% खबर इन लोगो की होती है जनता के सरोकारों का हिस्सा मात्र 6% या 7% ही रह गया है राजनैतिक तौर पर सत्ता जो लोकतंत्र पर बोलेगा वही सच माना जा रहा है गाँव को शहर मुर्ख बना रहा है शहरों को महा नगर मुर्ख बना रहा है अब तो आम आदमी को सोचना है कि वो किस लोकतंत्र में जियेगा ?
समाजवादी विचारक विजय नरायण जी ने कहा कि हमने बहुत सेमिनार देखे है पर आज मैं यह बात दावे से कह सकता हूँ वर्षो बाद आज के सेमिनार में गंभीर और सार्थक चर्चा हुई है इसके लिए शार्प रिपोटर के सम्पादक अरविन्द सिंह और उनका पूरा कुनबा बधाई का हकदार है डा योगेन्द्र नारायण अरुण ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि आज मैं बहुत ही प्रसन्न हूँ की मुझे इस पावन धरती पर आने का सौभाग्य मिला है उन्होंने आगे कहा की लोकतंत्र खतरे में है अगर मिडिया ने अपना चरित्र नही बदला तो हमारा लोकतन्त पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगा देश के अवाम को इस बात को समझना होगा वो मात्र किसी नेता के लिए वोट नही है उसका वोट नैतिक मूल्यों का वोट है अभी भी वक्त है सम्भाल जाओ मरते लोकतंत्र को बचाने के लिए आगे आओ |